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चुनावी ट्रेंड सेट करता है सट्टा बाजार………….

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करोड़ों-अरबों का खेल
आज उसी परंपरागत बाजार में चुनावी सट्‌टे की गरमी छाई हुई है. मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की चुनावी हार-जीत तय हो रही है. मुंबई, राजस्थान के नेटवर्क से चलने वाला यह बाजार सत्ता के सेमिफाइनल में कांग्रेस और बीजेपी की हार-जीत पर दांव लगा रहा है. अनुमान है कि देश भर के सटोरियों के दम पर चल रहा ये कारोबार 20 हजार करोड़ तक का हो सकता है.
सट्‌टा बाजार के मुताबिक, मध्य प्रदेश, राजस्थान में कांग्रेस आगे है, वहीं छत्तीसगढ़ में पांच सीटों के अंतर से चुनाव नतीजे बीजेपी के पक्ष में हैं. पिछले एक हफ्ते में मामूली फेरबदल से यही स्थितियां बनी हुई है. सट्टा बाजार में चल रही अटकलों के मुताबिक, मध्य प्रदेश में कुल 230 में से कांग्रेस 114-116 सीट पर जीत रही है. वहीं बीजेपी को 101-103 सीट मिलने का अनुमान है. उधर राजस्थान में विधानसभा की कुल 200 सीटों में से 127- 129 सीट कांग्रेस, तो 54-56 सीट बीजेपी को जा रही हैं, जबकि छत्तीसगढ़ में कुल 90 सीटों में से बीजेपी 43-45 पर, तो कांग्रेस के 38-40 सीट पर जीतने का अनुमान लगाया जा रहा है.
चुनावी ट्रेंड सेट करता है सट्टा बाजार
सट्‌टा बाज़ार में चल रहे इस हार-जीत के खेल ने चुनावी माहौल को मसालेदार बना दिया है. बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही दलों के दिग्गज नेताओं की नज़र सट्‌टा बाजार पर गड़ी हैं. माना जाता है कि सट्‌टा बाजार चुनावी ट्रेंड को सेट करता है. इसलिए कमज़ोर पड़ रहे कई नेता अपने ख़ास लोगों के ज़रिए सट्टा बाज़ार में अपना पैसा लगा रहे हैं. लेकिन बहुत ही ईमानदारी से चलने वाले इस गैरकानूनी कारोबार में कोई सट्‌टा खेलने वाला नहीं मिल रहा है.
नेता से भी आगे
सट्‌टा कारोबारियों का अपना नेटवर्क है, जो किसी राजनेता से भी ज़्यादा पैनी नज़र और समझ रखते हैं. ये लोग बाज़ार को समझ कर उम्मीदवार की हार-जीत, किसी भी दल को लेकर जनता की राय, समय से पहले भांप जाते हैं. इसी फीड बैक पर बाज़ार में पैसा लगता है. जो जीतने वाला होगा उसका भाव कम होता है, हारने वाले का ज्यादा. इससे जो हवा बनती है वो बाज़ार के साथ-साथ राजनीतिक गलियारों तक पहुंच कर माहौल को गरमा देती है.
‘जनता बेल-बूटे देखती है हम फूटा हुआ पेंदा’
इंदौर के सर्राफा की तंग दुकानें, जिसे गुदड़ी कहते हैं, वहां पर पारंपरिक गोल तकिए लगाए कारोबारियों की बड़ी जमात है. इनमें से कई लोग सट्‌टे के बड़े कारोबारी हैं. नाम और पहचान छुपाने की शर्त पर वे बताते हैं कि ये एक व्यापार है. यहां लोगों का करोड़ों रुपए लगा हुआ है. इसलिए इसमें कोई फर्ज़ीवाड़ा नहीं चलता. जनता, राजनीतक दल किसी भी उम्मीदवार के ऊपरी बेल-बूटे देखती है. सट्‌टा कारोबारी अंदर से फूटे पेंदे को देखता है. यहीं बुनियादी फर्क इसमें है.
10 पैसे से लेकर डेढ़ रुपए तक भाव
यहां ना कोई नेता बड़ा है और ना कोई छोटा. ना किसी पार्टी से मोहब्बत है, ना किसी से दुश्मनी. जो दमदार है उसी पर सट्‌टे का दांव है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे, डॉ. रमन सिंह सबकी सीटों का यहां आंकलन हो रहा है और भाव खुल रहे हैं. 10 पैसे से लेकर डेढ़ रुपए तक के भाव चल रहे हैं. कई मंत्रियों और हाई प्रोफाइल सीटों को लेकर जमकर दांव लग रहे हैं. जो सीटें सुरक्षित हैं उन्हें लेकर कोई हलचल नहीं है. मध्यप्रदेश के कई मंत्रियों की सट्‌टा बाज़ार हार बता रहा है.
थाह लगा पाना मुश्किल
सट्‌टा बाजार से जुड़े एक बुकी बताते हैं कि ये कारोबार ज़मीन पर नहीं दिखता. ये पूछने पर कि इसका सिरा कहां पर है और कहां तक फैला है, तो वे कहते हैं कि इसकी थाह लगा पाना बहुत मुश्किल है. पान की दुकान से लेकर नाई की दुकान तक, धन्नासेठों से लेकर कारोबारियों तक इससे जुड़े हुए हैं. ये शौक है, ये मौज है, और कई लोगों के लिए लत भी है.
फर्ज़ी तरीके से भाव नहीं घटते
धंधा बहुत चोखा है, इसलिए बहुत बारिकी और ध्यान से होता है. वे उदाहरण देते हैं कि इंदौर की एक प्रतिष्ठित सीट पर प्रत्याशी के भाव ठीक करने के लिए 25 पेटी उनके खास लोग उतारना चाह रहे थे, लेकिन कोई बुकी तैयार नहीं हुआ. कारण है प्रत्याशी के भाव कम होते ही रिजल्ट उल्टा आया तो नुकसान की भरपाई कैसे होगी.
गुजरात में फेल हुआ सट्‌टा
ये जो भाव खुले रहे हैं या जो हार-जीत तय हो रही है इसमें कितनी सच्चाई है? इस पर बाज़ार के लोगों का कहना है कारोबारी दस से बीस प्रतिशत का मार्जिन लेकर चलता है. गुजरात चुनाव में सट्‌टा फेल भी हुआ है. इसकी वजह है नए दौर का माहौल, जिसने इस बाज़ार को भी बहुत हद तक प्रभावित किया है.
कभी पानी पतरे का सट्‌टा होता था
वहीं पर बैठे एक बुज़ुर्ग कारोबारी कहते हैं कि एक समय था जब इंदौर में पानी- पतरे का सट्‌टा होता था. सर्राफा बाजार में बिल्डिंग्स की बालकनियों में खड़े रहकर पानी की धार, उसकी तेज़ी और पतरे पर गिरने वाली बूंदों पर भी सट्‌टा करते थे. अब बहुत हद तक इसकी जगह वायदा कारोबार ने ले ली है.
जब सट्‌टे को लीगल करने की बात हुई
वे उस दौर को याद करते हैं जब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रकाशचंद्र सेठी थे, जिन्हें गुदड़ी के लाल कहा जाता था. वे भी यहां पर बैठते थे. एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं कि जब सेठी जी मुख्यमंत्री बने तो उनसे सट्‌टे पर तीखा सवाल किया गया था. इस पर वे बहुत नाराज़ हुए. उन्होंने जवाब दिया था – मेरा बस चलेगा तो मैं इंदौरी सट्‌टे को लीगल कर दूंगा. इस पर बड़ी हेडलाइंस बनीं और उन्हें प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को जवाब देना मुश्किल हो गया था.
सट्टे के भाव से परेशान नेता
अब सट्‌टे को लेकर कोई नेता खुलकर बात नहीं करता, लेकिन चुनाव आते ही अपने भाव जानने के लिए और सट्‌टे में अपनी जीत के लिए आश्वस्ती जरूर चाहता है. सट्‌टे का यह ट्रेंड कितना मायने रखता है इसकी बानगी सोशल मीडिया पर लिखे जा रहे मैसेज हैं. जिसमें वे शिवराज सरकार की खूबियां गिनाते हुए कह रहे हैं कि बहस की कोई गुंजाइश नहीं है. सरकार तो शिवराज की ही बन रही है.

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