नरसिंहपुर। जिला मुख्यालय से करीब 20 किमी दूर आमगांव में दुर्लभ प्रजाति के पीले मेंढ़कों के झुंड़ ने ग्रामीणों के बीच कौतूहल पैदा कर दिया। गांव के एक स्थान पर भरे पानी में करीब दो दर्जन से अधिक भारतीय पीले मेंढ़क चहलकदमी करते दिखे। दो-तीन दिन पहले हुई बारिश के बाद आमगांव में अचानक से पीले मेंढ़कों का झुंड़ निकलते ही ग्रामीण अचरज में पड़ गए। इसके पहले तक वे काले, हल्का पीलापन लिए या हरे रंग के ही मेंढ़क देख चुके थे, लेकिन पूरी तरह पीलापन लिए इन मेंढ़कों को उन्होंने पहली बार देखा था। इन मेंढ़कों की आवाज भी आम मेंढ़कों से अलग कर्कश भरी थी, जो आमलोगों को उत्सुकता के साथ कहीं न कहीं डरा भी रही थी। पीले मेंढ़कों को लेकर जंतु विशेषज्ञों का कहना है कि ये खतरनाक नहीं, बल्कि आम मेंढ़कों की ही तरह हैं।
यह बात अलग है कि इनका पीलापन इन्हें अन्य मेंढ़कों से अलग करता है। जंतु विशेषज्ञ व मेंढ़कों पर रिसर्च कर रहे पुणे के डॉ. आनंद पांडे के अनुसार आमगांव में देखे गए पीले मेंढ़कों दरअसल दुर्लभ प्रजाति के हैं। इनका वैज्ञानिक नाम होपलोब्राटेचस टाइगरिनस है। आमतौर पर ये भूरे रंग से लेकर हल्के हरे रंग में दिखाई देते हैं।
वर्तमान जुलाई का माह मेंढ़कों का ब्रीडिंगकाल माना जाता है, इसलिए पहली बारिश में इनका पीलापन उभरकर सामने आ जाता है। डॉ. पांडे के अनुसार कुछ दिन पहले ही इसी तरह के पीले मेंढ़कों का झुंड़ मुंबई व पुणे के आबादी वाले क्षेत्रों में देखने को मिला था। अभी तक इस तरह की प्रजाति के मेंढ़क अमूमन जंगलों में ही पाए जाते थे। समुद्री द्वीप पर इनका डेरा अधिक रहता है, लेकिन अब शहरी-ग्रामीण आबादी वाले इलाकों की इनकी उपस्थिति ये बता रही है कि, पीले मेंढ़कों की तादाद तेजी से बढ़ रही है। ये जंतु विज्ञानियों के लिए उत्साहजनक है। किसी जगह ये एक साथ झुंड़ में दिखाई दें तो समझ लेना चाहिए कि वे मेटिंग के लिए एकत्र हुए हैं। ये मेंढ़क फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को नियंत्रित करने के लिए फायदेमंद हैं। कुल मिलाकर ये किसानों के सबसे अच्छे दोस्त कहे जा सकते हैं। पीले मेंढ़क आमतौर हावड़ा पश्चिम बंगाल में ही पाए जाते हैं।