मूलनिवासी दिवस को जातीय विभाजन नहीं, समरसता और जनजातीय संस्कृति के संरक्षण का अवसर बनाने की जरूरत
श्याम सिंह मरकाम रायपुर। 9 अगस्त को मनाए जाने वाले अंतरराष्ट्रीय दिवस को लेकर देश में लंबे समय से ‘विश्व आदिवासी दिवस’ और ‘विश्व मूलनिवासी दिवस’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल को लेकर बहस होती रही है। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव श्याम सिंह मरकाम के पक्ष से इस विषय को व्यापक सामाजिक दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।

उनका कहना है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय दिवस का उद्देश्य समाज को जोड़ना होना चाहिए, न कि जाति, वर्ग अथवा समुदाय के बीच वैमनस्य पैदा करना।
मरकाम के पक्ष में उठाए जा रहे सवालों में प्रमुख मुद्दा यह है कि भारत के संविधान में ‘आदिवासी’ शब्द के स्थान पर संवैधानिक व्यवस्था में मुख्यतः ‘अनुसूचित जनजाति’ (Scheduled Tribes) शब्द का प्रयोग किया गया है। ऐसे में संविधान और संवैधानिक अधिकारों की चर्चा करने वालों को शब्दावली और उसके ऐतिहासिक-सामाजिक संदर्भ को भी स्पष्ट रूप से समझना चाहिए।
‘मूलनिवासी’ की अवधारणा पर भी हो खुली चर्चा
इस दृष्टिकोण के अनुसार यदि 9 अगस्त को ‘विश्व मूलनिवासी दिवस’ के रूप में देखा जाता है, तो दुनिया के प्रत्येक देश और क्षेत्र के मूलनिवासी समुदायों को इसमें सहभागी होने का समान अधिकार होना चाहिए।
भारत में भी विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों से आकर बसे समाजों को केवल इसलिए अलग नहीं किया जा सकता कि वे वर्तमान निवास वाले राज्य के स्थानीय मूलनिवासी नहीं हैं।

छत्तीसगढ़ में निवास करने वाले अघरिया, सोंढिया, महरा, मेहर सहित अनेक समुदायों की ऐतिहासिक जड़ें पड़ोसी ओडिशा सहित अन्य क्षेत्रों से जुड़ी हुई हैं। इसी प्रकार सरगुजा-जशपुर क्षेत्र में उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड से आए विभिन्न समाज तथा रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, भिलाई, कोरबा और अन्य क्षेत्रों में बसे सिंधी, पंजाबी, मारवाड़ी एवं मराठी समाज भी भारत के ही अलग-अलग क्षेत्रों की सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं।
ऐसे में ‘विश्व’ की अवधारणा को केवल किसी एक वर्ग तक सीमित करने के बजाय भारत की विविधता को स्वीकार करते हुए सभी समुदायों को साथ लेकर चलने की जरूरत है।
साथ ही किसी पूरे धार्मिक समुदाय के प्रति नफरत के बजाय गलत गतिविधियों का विरोध करने और अच्छे कार्यों से सीख लेने की सोच विकसित करने पर जोर दिया गया है। दुर्गम क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और सेवा के क्षेत्र में लंबे समय तक काम करने वाले लोगों के समर्पण से सीख लेकर भारतीय समाज को भी अपनी जनजातीय एवं ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा की भावना मजबूत करनी चाहिए।
दूसरे समाजों से नफरत नहीं, उनसे सीखने की जरूरत
इस विचारधारा में यह भी कहा गया है कि किसी समाज की सामूहिक आलोचना करने के बजाय उसकी सकारात्मक खूबियों से सीखना चाहिए। शिक्षा, व्यवसाय, संगठन, बचत, सामाजिक सहयोग और कठिन परिस्थितियों में संघर्ष जैसे क्षेत्रों में विभिन्न समाजों की उपलब्धियों का अध्ययन करके जनजातीय समाज भी आगे बढ़ सकता है।
शिक्षा के क्षेत्र में पुराने समय के शिक्षकों की कार्यनिष्ठा का उदाहरण देते हुए सवाल उठाया गया है कि आज शिक्षक और शिक्षा व्यवस्था को किस प्रकार और बेहतर बनाया जा सकता है। इसके लिए केवल किसी एक वर्ग को दोषी ठहराने के बजाय पूरी शिक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक तंत्र और सामाजिक जिम्मेदारी की समीक्षा आवश्यक है।

आरक्षण अधिकार है, लेकिन मेहनत का विकल्प नहीं
जनजातीय समाज को संविधान द्वारा मिले आरक्षण एवं अन्य संवैधानिक अधिकारों को महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए यह भी कहा गया है कि अधिकारों के साथ जिम्मेदारी और मेहनत भी आवश्यक है। आरक्षण को अवसर के रूप में इस्तेमाल करते हुए शिक्षा, रोजगार, प्रशासन, व्यवसाय और अन्य क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन की दिशा में प्रयास होना चाहिए।
इसी प्रकार व्यापारिक समाजों की मेहनत, बचत और सामाजिक संस्थाओं को सहयोग देने की परंपरा से भी सीख लेने की आवश्यकता बताई गई है। दूसरे राज्यों से आकर कठिन परिस्थितियों में अपना स्थान बनाने वाले लोगों की मेहनत और संगठन क्षमता से भी प्रेरणा ली जा सकती है।
9 अगस्त के आयोजनों में युवाओं के भविष्य पर हो चर्चा
विश्व मूलनिवासी दिवस अथवा विश्व आदिवासी दिवस के आयोजनों को केवल बड़े मंच, रैली और सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक सीमित रखने के बजाय युवाओं के वास्तविक भविष्य से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
डीजे संस्कृति, शराब, नशा, जुआ, सोशल मीडिया की अंधी प्रतिस्पर्धा, वायरल होने की मानसिकता और आधुनिकता के नाम पर अपनी संस्कृति से दूरी जैसे विषयों पर समाज को गंभीरता से विचार करना चाहिए।
साथ ही जनजातीय भाषाओं, लोकगीतों, लोकनृत्यों, पारंपरिक ज्ञान और सामाजिक मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की ठोस योजना बननी चाहिए।
‘जनजातीय गौरव दिवस’ को भी मिले समान महत्व
भारत सरकार द्वारा बिरसा मुंडा की जयंती 15 नवंबर को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में मनाया जाना जनजातीय समाज के लिए गौरव का विषय है।

ऐसे अवसरों का उपयोग जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों, सामाजिक नायकों और सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी से जोड़ने के लिए किया जाना चाहिए।
मरकाम के पक्ष में उठाए गए विचारों के अनुसार 9 अगस्त को लेकर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा पैदा करने के बजाय इसे सामाजिक आत्ममंथन का अवसर बनाया जाना चाहिए। सवाल यह होना चाहिए कि जनजातीय समाज शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, भूमि संरक्षण, संस्कृति और आर्थिक स्वावलंबन में कैसे आगे बढ़े।
समाज को बांटने के बजाय जोड़ने की जरूरत
इस पूरे विमर्श का मूल संदेश यही है कि शोषण किसी जाति या समाज का नहीं, बल्कि व्यक्ति और व्यवस्था के गलत आचरण का परिणाम हो सकता है। इसलिए किसी पूरे समाज को दोषी ठहराना उचित नहीं है।
भारत की शक्ति उसकी विविधता और सामाजिक समन्वय में रही है। अलग-अलग जाति, जनजाति, भाषा, क्षेत्र और परंपराओं के लोग मिलकर भारतीय समाज का निर्माण करते हैं। इसलिए 9 अगस्त जैसे अवसरों को आपसी संघर्ष का माध्यम बनाने के बजाय संवाद, संस्कृति संरक्षण, शिक्षा, विकास और सामाजिक समरसता का मंच बनाया जाना चाहिए।
गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव श्याम सिंह मरकाम के पक्ष से यह संदेश सामने आता है कि जनजातीय समाज को अपने अधिकारों और पहचान पर गर्व करते हुए दूसरे समाजों से नफरत करने के बजाय उनकी सकारात्मक उपलब्धियों से सीखना चाहिए। अपनी संस्कृति को बचाते हुए आधुनिक शिक्षा और विकास की दौड़ में आगे बढ़ना ही समाज के भविष्य का रास्ता है।
भारत माता की जय।

