देश की सबसे संवेदनशील और विशेष पिछड़ी जनजातियों (PVTG) में शामिल पण्डो समाज के युवाओं के सामने पहचान और अधिकार का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
समाज का कहना है कि सदियों से जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले समुदाय से आज 1946-47 के लगभग 80 वर्ष पुराने दस्तावेज़ मांगे जा रहे हैं, जबकि अधिकांश परिवारों के पास ऐसे अभिलेख उपलब्ध होना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।
समाज के प्रतिनिधियों का आरोप है कि इसी शर्त के कारण हजारों छात्र-छात्राएं जाति प्रमाण पत्र, छात्रवृत्ति, उच्च शिक्षा में प्रवेश, सरकारी योजनाओं और रोजगार के अवसरों से वंचित हो रहे हैं। युवाओं का कहना है कि यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का विषय नहीं, बल्कि उनके संवैधानिक अधिकारों और भविष्य से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।

पण्डो समाज का दावा है कि इस संबंध में राष्ट्रीय स्तर के आयोगों के निर्देश, संभागीय कमिश्नर की रिपोर्ट तथा विभिन्न शासकीय आदेशों में भी व्यावहारिक समाधान अपनाने की बात कही गई है, लेकिन कई क्षेत्रों में आज भी पुराने दस्तावेज़ों की अनिवार्यता के कारण पात्र लोगों को लाभ नहीं मिल पा रहा है।
समाज के पदाधिकारियों का कहना है कि यदि समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं हुआ तो विशेष पिछड़ी जनजाति के हजारों युवाओं का भविष्य प्रभावित होगा। उनका आग्रह है कि सरकार ऐतिहासिक परिस्थितियों और जनजातीय जीवनशैली को ध्यान में रखते हुए प्रमाण-पत्र जारी करने की प्रक्रिया को सरल और न्यायसंगत बनाए, ताकि पात्र परिवारों को शिक्षा, छात्रवृत्ति, आरक्षण और रोजगार जैसी संवैधानिक सुविधाओं का लाभ मिल सके।

विशेषज्ञों का मानना है कि विशेष पिछड़ी जनजातियों के संरक्षण और उत्थान के लिए बनाई गई योजनाओं का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब पात्र समुदायों को अनावश्यक दस्तावेज़ी बाधाओं से राहत मिले और प्रशासनिक प्रक्रियाएं व्यवहारिक एवं संवेदनशील बनें।
जनजातीय समाज की प्रमुख मांगें:
1946-47 के दस्तावेज़ों की अनिवार्यता समाप्त की जाए।
आयोगों और शासकीय आदेशों का प्रभावी पालन सुनिश्चित किया जाए।
पात्र युवाओं को बिना अनावश्यक विलंब के जाति प्रमाण पत्र जारी किए जाएं।
शिक्षा, छात्रवृत्ति, आरक्षण और रोजगार संबंधी अधिकारों की तत्काल बहाली सुनिश्चित की जाए।

