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छत्तीसगढ़, एमसीबी, सफलता की कहानी, महिला कृषि सखियों की पहल बनी बदलाव की मिसाल: प्राकृतिक खेती से आत्मनिर्भर बन रहे 1200 किसान बिहान योजना ने बदली खेती की तस्वीर: महिला कृषि सखियों के प्रयासों से प्राकृतिक खेती को मिली नई पहचान

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सफलता की कहानी

एमसीबी/20 जुलाई 2026/ कभी रासायनिक खाद और महंगे कीटनाशकों पर निर्भर रहने वाले मनेंद्रगढ़ विकासखंड के किसान आज प्राकृतिक खेती की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं। इस बदलाव की सबसे बड़ी ताकत बनी हैं बिहान योजना के अंतर्गत कार्यरत महिला कृषि सखियां, जिन्होंने अपने ज्ञान, समर्पण और सतत प्रयासों से खेती को नई दिशा दी है। आज लगभग 1200 किसान प्राकृतिक एवं टिकाऊ खेती से जुड़ चुके हैं और खेती की लागत घटाने के साथ बेहतर उत्पादन की ओर बढ़ रहे हैं।


गांव-गांव संचालित आजीविका सेवा केंद्र इस परिवर्तन के केंद्र बन चुके हैं। यहां नियमित रूप से कृषक पाठशालाओं का आयोजन कर किसानों को प्राकृतिक खेती, जैविक उर्वरक निर्माण, बीज उपचार, उन्नत कृषि तकनीक और किचन गार्डन की जानकारी दी जा रही है। इन प्रशिक्षणों में महिला कृषि सखियां केवल जानकारी ही नहीं देतीं, बल्कि खेतों में स्वयं प्रदर्शन कर किसानों का आत्मविश्वास भी बढ़ाती हैं।
हाल ही में ग्राम डिहुली में स्थापित आजीविका सेवा केंद्र में महिलाओं को स्थानीय संसाधनों से जीवामृत, घन जीवामृत, जीवामृत, ब्रह्मास्त्र, अग्निअस्त्र और नीम आधारित जैविक कीटनाशक तैयार करने का प्रशिक्षण दिया गया। इससे किसान अब महंगे रासायनिक उत्पादों पर निर्भर रहने के बजाय अपने गांव में ही कम लागत में जैविक उत्पाद तैयार कर रहे हैं। महिला कृषि सखियां किसानों को बरबटी, लौकी, टमाटर, छतनुमा मचान और तिकोना मचान पद्धति जैसी आधुनिक एवं वैज्ञानिक तकनीकों से सब्जी उत्पादन के लिए प्रेरित कर रही हैं। इन तकनीकों से फसलों में रोग कम लगते हैं, उत्पादन बढ़ता है और सब्जियों की गुणवत्ता भी बेहतर होती है।


“हर घर किचन गार्डन” अभियान ने ग्रामीण परिवारों के जीवन में भी सकारात्मक बदलाव लाया है। अब महिलाएं अपने घरों में मौसमी सब्जियां उगा रही हैं, जिससे परिवारों को ताजा और पौष्टिक भोजन मिल रहा है तथा बाजार से सब्जियां खरीदने का खर्च भी कम हुआ है। इसके साथ ही एकीकृत कृषि प्रणाली के अंतर्गत हल्दी उत्पादन, ग्राफ्टेड टमाटर की खेती, बकरी एवं मुर्गी पालन जैसी गतिविधियों को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे किसानों की आय के नए स्रोत विकसित हो रहे हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है। आज डिहुली, पिंड्रा-घुटरा, परसगढ़ी और लोहारी के आजीविका सेवा केंद्रों में तैयार जैविक उत्पाद अब स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कराए जाएंगे, जिससे किसानों को गुणवत्तापूर्ण जैविक सामग्री आसानी से मिल सकेगी। यह पहल गांवों में रोजगार के नए अवसर भी सृजित कर रही है।
महिला कृषि सखियों का मानना है कि प्राकृतिक खेती केवल खेती की एक नई पद्धति नहीं, बल्कि किसानों के जीवन में स्थायी समृद्धि का माध्यम है। कम लागत, बेहतर उत्पादन, स्वस्थ मिट्टी, सुरक्षित पर्यावरण और गुणवत्तापूर्ण खाद्यान्न इन सभी लक्ष्यों को एक साथ हासिल करने में यह अभियान महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। आज मनेंद्रगढ़ की महिला कृषि सखियां यह साबित कर रही हैं कि यदि महिलाओं को अवसर, प्रशिक्षण और जिम्मेदारी मिले तो वे केवल अपने परिवार ही नहीं, बल्कि पूरे गांव की तस्वीर बदल सकती हैं। उनके प्रयासों से प्राकृतिक खेती का यह अभियान किसानों के लिए प्रेरणा बन गया है और आत्मनिर्भर, समृद्ध एवं टिकाऊ कृषि की दिशा में एक सशक्त उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है।

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