खबर (गणेश सोनी | सिटी रिपोर्टर)
शहडोल / जयसिंहनगर
ग्राम पंचायत सीधी में सार्वजनिक धन से निर्मित सामुदायिक शौचालय अब प्रशासनिक उदासीनता, कब्जाधारी प्रवृत्ति और स्वच्छता व्यवस्था की विफलता का प्रतीक बनता जा रहा है।
वर्ष 2018 में सांसद मद से लगभग 4 लाख रुपये की लागत से बनाए गए इस सार्वजनिक शौचालय का 7 जून 2018 को तत्कालीन सांसद रीति पाठक द्वारा विधिवत लोकार्पण किया गया था, लेकिन विडंबना यह है कि वर्षों बाद भी यह सुविधा आम ग्रामीणों के लिए पूरी तरह उपलब्ध नहीं हो सकी।
ग्रामीणों और स्थानीय सूत्रों के अनुसार, निर्माण के बाद से ही इस सामुदायिक संपत्ति पर गांव के कुछ प्रभावशाली लोगों का कब्जा बना रहा।
मामला सामने आने और मीडिया में खबर प्रकाशित होने के बाद पुरुष शौचालय का ताला तो खोल दिया गया, लेकिन महिला शौचालय आज भी बंद पड़ा हुआ है।
इससे पंचायत प्रशासन की कार्यशैली और संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
स्थिति की गंभीरता तब और बढ़ गई जब एक ग्रामीण शौचालय उपयोग करने पहुंचा तो अंदर गंदगी, मल-मूत्र भरा होने और साफ-सफाई का अभाव देखने को मिला।
आरोप है कि वर्षों से बंद रहने के कारण शौचालय बदहाल हो चुका है और उसकी नियमित सफाई तक नहीं कराई गई। यह हालात सीधे तौर पर पंचायत सचिव और कथित कब्जाधारियों की जवाबदेही तय करते हैं।
जब इस विषय में पंचायत सचिव से चर्चा की गई तो उन्होंने किसी “समूह” का हवाला देकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया।

हालांकि सवाल यह उठता है कि सार्वजनिक संपत्ति पर यदि अवैध कब्जा था, तो पंचायत और जनपद प्रशासन ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की?
क्या पंचायत प्रशासन अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहा या फिर पूरे मामले में जानबूझकर चुप्पी साधी गई?
स्वच्छ भारत मिशन के तहत केंद्र और राज्य सरकारें करोड़ों रुपये खर्च कर ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता व्यवस्था मजबूत करने का दावा कर रही हैं,
लेकिन सीधी पंचायत का यह मामला उन दावों की जमीनी हकीकत उजागर करता नजर आ रहा है। एक ओर मंचों से स्वच्छता अभियान की सफलता के दावे किए जाते हैं,


वहीं दूसरी ओर महिलाओं के लिए बना सार्वजनिक शौचालय वर्षों तक बंद पड़ा रहना प्रशासनिक लापरवाही का बड़ा उदाहरण माना जा रहा है।
राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टिकोण से भी यह मामला बेहद संवेदनशील माना जा रहा है। जनप्रतिनिधियों द्वारा लोकार्पित योजनाएं यदि उपयोग से पहले ही कब्जे और अव्यवस्था की भेंट चढ़ जाएं, तो इससे न केवल सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं,
बल्कि ग्रामीणों का जनतांत्रिक व्यवस्था से भरोसा भी कमजोर होता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जिला प्रशासन और जनपद पंचायत जयसिंहनगर इस मामले को गंभीरता से लेते हुए महिला शौचालय को तत्काल कब्जामुक्त कराकर साफ-सफाई और संचालन सुनिश्चित करेगा,
या फिर यह करोड़ों के स्वच्छता अभियान पर एक और बदनुमा दाग बनकर रह जाएगा।

