मुख्यालय बैकुण्ठपुर में आए दिन यही सुनने को मिलता है कि अधिकारी और जनपद पंचायतों में कमीशनखोरी के विवाद खुलकर सामने आ रहे हैं। पहले भी जनपद पंचायत से संबंधित समाचार प्रकाशित किए गए थे, और अब स्थिति यह है कि अधिकारी तथा जनप्रतिनिधि स्वयं कलेक्टर महोदया के समक्ष एक-दूसरे की शिकायतें कर रहे हैं।
ग्रामों के विकास कार्यों के लिए राज्य शासन द्वारा जो धनराशि दी जाती है, उसमें जनप्रतिनिधि, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सीईओ, सचिव और सरपंचों द्वारा कमीशन की मांग की जा रही है — ऐसी चर्चाएँ आम हो गई हैं। सवाल यह उठता है कि क्या जनता द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधियों को भी कमीशन चाहिए? और क्या सीईओ जैसे शासकीय अधिकारी को भी रिश्वत लेनी चाहिए?
अब समस्या यह है कि इन लोगों में कमीशन के प्रतिशत को लेकर तालमेल नहीं बन पा रहा है। जबकि जनपद अध्यक्ष कांग्रेस पार्टी से हैं और उपाध्यक्ष भारतीय जनता पार्टी से। सीईओ एक शासकीय अधिकारी हैं। इस तरह के आरोप पहले भी लगे थे — जब कांग्रेस की सरकार थी, तब भी इस प्रकार की कमीशनखोरी प्रचलित थी। उस समय कांग्रेस विधायक ने भी सीईओ का पक्ष लिया था।
अब जबकि वर्तमान में सत्ताधारी विधायक भाजपा से हैं, देखना यह होगा कि वे किसका समर्थन करते हैं, क्योंकि कलेक्टर महोदया के सामने विधायक को ही सर्वेसर्वा माना जा रहा है — जो विधायक कहेंगे, वही होगा।
अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सीईओ — सभी ने अपनी-अपनी लिखित शिकायतें कलेक्टर महोदया को सौंप दी हैं। सचिव वर्ग का कुछ हिस्सा सीईओ के पक्ष में है, तो कुछ जनप्रतिनिधियों के समर्थन में। ऐसे भ्रष्टाचारियों के बीच जनता का हित पूरी तरह से उपेक्षित होता जा रहा है।
आज स्थिति यह है कि कोरिया ज़िला भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुका है।
राजस्व विभाग की हालत भी कुछ अलग नहीं है — वहाँ बिना पैसे के कोई काम नहीं होता। “पैसा दो, काम लो” की नीति खुलकर लागू है। यह समस्या केवल बैकुण्ठपुर तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में राजस्व विभाग के भ्रष्टाचार की चर्चा होती रहती है।
बताया जा रहा है कि राजस्व विभाग के कुछ कर्मचारियों — पटवारी, आरआई और तहसीलदार — ने पैसे लेकर प्रेमाबाग क्षेत्र की सरकारी ज़मीन अपने रिश्तेदारों, जैसे बाप-बेटे, पत्नी आदि के नाम पर पट्टा कर दी है। सवाल उठता है कि क्या छत्तीसगढ़ शासन ऐसे लोगों को ही इन पदों पर नियुक्त करता है? अब तो यह स्थिति है कि जो व्यक्ति पैसे देता है, वह कहीं भी — चाहे सड़क पर हो या सरकारी ज़मीन पर — निर्माण कर सकता है।
अब देखना यह होगा कि विधायक महोदय इस गंभीर मुद्दे का क्या समाधान निकालते हैं, क्योंकि विधानसभा क्षेत्र का प्रमुख प्रतिनिधि विधायक ही होता है। इस कारण, इस पूरे मामले की जिम्मेदारी विधायक और कलेक्टर — दोनों की मानी जाती है।
यह विषय निस्संदेह विस्तृत जांच का पात्र है।
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