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कोरिया/CG : खनन-खनिज के पर्दे में क्या बन गया है गुरु घासीदास‑तमोरपिंगला टाइगर रिज़र्व भ्रष्टाचार का गढ़?………….

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गुरु घासीदास‑तमोरपिंगला टाइगर रिज़र्व (छत्तीसगढ़ के कोरिया जिला व आसपास) में हाल-फिलहाल जो घटनाएँ सामने आई हैं, वे इस बात का संकेत देती हैं कि सुरक्षित वन्यजीव क्षेत्र में भी गंभीर चुनौतियाँ और संभवतः गहरी दुर्ग-स्थिति बनी है।

सुनी-पढ़ी बातें

इस क्षेत्र में बाघों की मौत की घटनाएँ सामने आई हैं — उदाहरण के लिए, कोरिया जिले में एक वयस्क बाघ का शव मिला, जिसमें आँख-नाखून-दांत गायब पाए गए और ज़हर का शक जताया गया है। वन विभाग द्वारा क्षेत्र-निर्देशन, पेट्रोलिंग, स्टाफिंग आदि अनेक कमजोरियाँ सार्वजनिक हुई हैं। इस रिज़र्व को घोषित करने की प्रक्रिया में लगातार देरी रही है — पहले केन्द्र ने मंज़ूरी दे दी थी लेकिन राज्य सरकार द्वारा नोटिफिकेशन की अड़चनें आईं। विशेष रूप से यह क्षेत्र खनिज-आधारित रूप से महत्वपूर्ण है — जहाँ कोयला भंडार, मिथेन गैस आदि मौजूद बताए गए हैं, जिसने रिज़र्व घोषित करने प्रक्रिया को रोकने में भूमिका निभाई।

भ्रष्टाचार-संकेत

जब एक वन्यजीव संरक्षण-क्षेत्र में बाघों की मृत्यु, कमजोर मॉनिटरिंग, स्टाफिंग की कमी और नोटिफिकेशन-विलंब जैसी स्थितियाँ सामने आती हैं, तो पर्यावरण-संरक्षण के नाम पर प्रणालीगत भ्रष्टाचार या लापरवाही के सवाल उठ खड़े होते हैं। यह सिर्फ वन विभाग की कार्य-प्रणाली का मामला नहीं, बल्कि उस क्षेत्र में खदान-खन्निज-पालन-वनराजस्व-उद्योग की जटिलताएँ भी जुड़ी हुई दिखती हैं।

हां — यह कह सकते हैं कि गुरु घासीदास-तमोरपिंगला क्षेत्र «भ्रष्टाचार का गढ़» बन चुका है या बनने के कगार पर है, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा। लेखित सार्वजनिक स्रोतों में स्पष्ट मामला भ्रष्टाचार का ट्रेस नहीं दिखता है, लेकिन प्रणालीगत विलंब, संसाधन-अभाव और संरक्षण व उद्योग के टकराव से ऐसा माहौल तैयार हुआ है, जिसमें भ्रष्टाचार-संधिग्ध हालात स्वाभाविक हो जाते हैं।

प्रमुख शिकायतें व दस्तावेज़-सबूत

  1. नोटिफिकेशन में देरी व संसाधन-रोचनाओं का हवाला
    राज्य सरकार ने इस रिज़र्व को तुरंत घोषित न कर पाने का कारण बताया: इस क्षेत्र में कोयला भंडार, कोयला-मिथेन गैस व तेल ब्लॉक्स मिले हैं, जिनकी वजह से उद्योग-विनियोजन-राजस्व-रूचि उभरी है। सुप्रीम-अधिकृत संस्था-पीएलआई (पीआईएल) में यह कहा गया कि वन विभाग एवं संसाधन विभाग के बीच स्पष्ट टकराव है। यह सवाल उठता है कि क्या सिर्फ “विलंब” है, या संसाधनों का लाभार्थी चक्र चल रहा है जिसमें टाइगर रिज़र्व घोषित ना होने देना सुविधाजनक रहा हो।

    2. वन्यजीव सुरक्षा व माहौल में कमी-शंका

    छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सरकार से पूछा कि बाघों की हत्या-मृत्यु की घटनाएँ हुईं हैं, आप क्या कर रहे हैं? इन घटनाओं के कारण वन्यजीव संरक्षण पर सरकार की जवाबदेही पर चर्चा है। जब संरक्षण की जिम्मेदारी कमजोर हो, तो वहाँ उद्योग-विनियोजन-अनुज्ञापन-लापरवाही का “मंच” बन जाता है।

    3. उद्योग-खनन-वन संरक्षण के बीच टकराव

    मुख्यमंत्री कार्यालय ने कहा कि रिज़र्व के आसपास “उपकरणीय प्राकृतिक संसाधन” ज्यादा हैं — कोयला, मिथेन-गैस, तेल-ब्लॉक्स आदि। इससे यह स्पष्ट है कि वन घोषणा, खान-अनुमोदन, भूमि उपयोग-परिवर्तन के बीच ‘संभावित आर्थिक हित’ हैं। जब उद्योग-विनियोजन गहरे हों, वहाँ न केवल “तंत्रगत भ्रष्टाचार” की संभावना बढ़ जाती है, बल्कि “विनियोजन-जाड” / “नीति-पारदर्शिता की कमी” भी उत्पन्न होती है।

इन बिंदुओं से यह साफ-साफ दिखाई देता है कि सिर्फ “प्राकृतिक संरचना” का मामला नहीं है — यह प्रशासनिक विलंब, हित संघर्ष, संसाधन-उपयोग, वन सुरक्षा-विनियोजन की लापरवाही का जटिल मिश्रण है। इसलिए कहा जा सकता है: हाँ, यह क्षेत्र “भ्रष्टाचार-संधिग्ध” स्थिति में है — पूर्ण साक्ष्य-फिक्सिंग नहीं मिली है कि विशिष्ट “रिश्वत/घोटाला” हुआ हो, लेकिन संरचनात्मक भ्रष्टाचार और लापरवाही की स्थितियाँ स्पष्ट रूप से मौजूद हैं।

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