हरी खाद (ढैंचा) से होगी धान की बेहतर खेती / प्राकृतिक खेती को मिलेगा बढ़ावा, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता होगी कम, 50 प्रतिशत अनुदान पर उपलब्ध कराया जा रहा ढैंचा बीज, मिट्टी की उर्वराशक्ति बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल
एमसीबी/22 जुलाई 2026/ प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने, रासायनिक उर्वरकों पर किसानों की निर्भरता कम करने तथा मिट्टी की उर्वराशक्ति को संरक्षित करने के उद्देश्य से कृषि विभाग द्वारा जिले के किसानों को हरी खाद (ढैंचा) के उपयोग के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इस पहल के तहत किसानों को 50 प्रतिशत अनुदान पर ढैंचा बीज उपलब्ध कराया जा रहा है, जिससे वे धान की रोपाई से पहले हरी खाद तैयार कर अपनी भूमि की उर्वरा क्षमता बढ़ा सकें। यह पहल टिकाऊ, कम लागत वाली एवं पर्यावरण अनुकूल खेती की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो रही है।
कृषि विभाग द्वारा वर्ष 2026-27 के लिए हरी खाद उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके अंतर्गत विकासखंड भरतपुर में 32 हेक्टेयर, खड़गवां में 24 हेक्टेयर तथा मनेन्द्रगढ़ में 32 हेक्टेयर क्षेत्र में ढैंचा की खेती का लक्ष्य दिया गया है। विभाग का उद्देश्य अधिक से अधिक किसानों को प्राकृतिक खेती एवं संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन के प्रति जागरूक करना है, ताकि कृषि उत्पादन के साथ-साथ मिट्टी के स्वास्थ्य का भी संरक्षण किया जा सके। जिले के दूरस्थ अंचल विकासखंड भरतपुर के ग्राम देवगढ़ निवासी प्रगतिशील किसान श्री सीताशरण तिवारी ने धान की रोपाई से पूर्व अपने खेत में ढैंचा की बुवाई कर अन्य किसानों के लिए प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया है। वर्तमान में उनके खेत में ढैंचा की हरी-भरी फसल लहलहा रही है, जो प्राकृतिक पोषण का महत्वपूर्ण स्रोत बनेगी। किसान श्री तिवारी का कहना है कि कृषि विभाग के मार्गदर्शन में उन्होंने हरी खाद की तकनीक अपनाई है, जिससे भविष्य में मिट्टी की गुणवत्ता और धान उत्पादन दोनों में सकारात्मक सुधार की उम्मीद है।
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार ढैंचा की फसल की बुवाई के लगभग 30 से 40 दिन बाद इसे ट्रैक्टर या हल की सहायता से खेत में पलटकर मिट्टी में मिला दिया जाता है। इसके बाद यह फसल प्राकृतिक रूप से विघटित होकर जैविक खाद का रूप ले लेती है, जिससे खेत को आवश्यक पोषक तत्व प्राप्त होते हैं। यह प्रक्रिया मिट्टी की उर्वराशक्ति बढ़ाने के साथ-साथ उसकी संरचना एवं गुणवत्ता में भी सुधार करती है। ढैंचा को हरी खाद के रूप में विशेष महत्व इसलिए प्राप्त है क्योंकि इसमें नाइट्रोजन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती है। विशेषज्ञों के अनुसार एक हेक्टेयर क्षेत्र में ढैंचा की हरी खाद का उपयोग करने से भूमि को लगभग 40 से 50 किलोग्राम नाइट्रोजन प्राकृतिक रूप से प्राप्त हो सकती है। इससे रासायनिक नाइट्रोजन उर्वरकों की आवश्यकता कम होती है और खेती की लागत में भी कमी आती है।
इसके अतिरिक्त ढैंचा मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ाने, मिट्टी की संरचना को बेहतर बनाने, जलधारण क्षमता में वृद्धि करने तथा जड़ों में रहने वाले सूक्ष्म जीवों के माध्यम से वायुमंडलीय नाइट्रोजन के स्थिरीकरण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इससे मिट्टी लंबे समय तक उपजाऊ बनी रहती है और फसल की गुणवत्ता एवं उत्पादन क्षमता में सुधार होता है। कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे फसल चक्र, हरी खाद, उन्नत एवं प्रमाणित बीज, संतुलित उर्वरक प्रबंधन तथा प्राकृतिक खेती की आधुनिक तकनीकों को अपनाएं। इन उपायों से कम लागत में अधिक एवं गुणवत्तापूर्ण उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। साथ ही मिट्टी का स्वास्थ्य भी सुरक्षित रहेगा, जिससे आने वाली पीढ़ियों के लिए कृषि अधिक टिकाऊ और लाभकारी बन सकेगी।
जिले के किसानों द्वारा हरी खाद के रूप में ढैंचा को अपनाने की बढ़ती पहल इस बात का संकेत है कि किसान अब प्राकृतिक एवं वैज्ञानिक खेती की ओर तेजी से अग्रसर हो रहे हैं। उचित फसल प्रबंधन, प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग तथा आधुनिक कृषि तकनीकों के समन्वय से खेती को अधिक लाभकारी, पर्यावरण अनुकूल और आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।
प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने, रासायनिक उर्वरकों पर किसानों की निर्भरता कम करने तथा मिट्टी की उर्वराशक्ति को संरक्षित करने के उद्देश्य से कृषि विभाग द्वारा जिले के किसानों को हरी खाद (ढैंचा) के उपयोग के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इस पहल के तहत किसानों को 50 प्रतिशत अनुदान पर ढैंचा बीज उपलब्ध कराया जा रहा है, जिससे वे धान की रोपाई से पहले हरी खाद तैयार कर अपनी भूमि की उर्वरा क्षमता बढ़ा सकें। यह पहल टिकाऊ, कम लागत वाली एवं पर्यावरण अनुकूल खेती की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो रही है।
कृषि विभाग द्वारा वर्ष 2026-27 के लिए हरी खाद उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके अंतर्गत विकासखंड भरतपुर में 32 हेक्टेयर, खड़गवां में 24 हेक्टेयर तथा मनेन्द्रगढ़ में 32 हेक्टेयर क्षेत्र में ढैंचा की खेती का लक्ष्य दिया गया है। विभाग का उद्देश्य अधिक से अधिक किसानों को प्राकृतिक खेती एवं संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन के प्रति जागरूक करना है, ताकि कृषि उत्पादन के साथ-साथ मिट्टी के स्वास्थ्य का भी संरक्षण किया जा सके। जिले के दूरस्थ अंचल विकासखंड भरतपुर के ग्राम देवगढ़ निवासी प्रगतिशील किसान श्री सीताशरण तिवारी ने धान की रोपाई से पूर्व अपने खेत में ढैंचा की बुवाई कर अन्य किसानों के लिए प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया है। वर्तमान में उनके खेत में ढैंचा की हरी-भरी फसल लहलहा रही है, जो प्राकृतिक पोषण का महत्वपूर्ण स्रोत बनेगी। किसान श्री तिवारी का कहना है कि कृषि विभाग के मार्गदर्शन में उन्होंने हरी खाद की तकनीक अपनाई है, जिससे भविष्य में मिट्टी की गुणवत्ता और धान उत्पादन दोनों में सकारात्मक सुधार की उम्मीद है।
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार ढैंचा की फसल की बुवाई के लगभग 30 से 40 दिन बाद इसे ट्रैक्टर या हल की सहायता से खेत में पलटकर मिट्टी में मिला दिया जाता है। इसके बाद यह फसल प्राकृतिक रूप से विघटित होकर जैविक खाद का रूप ले लेती है, जिससे खेत को आवश्यक पोषक तत्व प्राप्त होते हैं। यह प्रक्रिया मिट्टी की उर्वराशक्ति बढ़ाने के साथ-साथ उसकी संरचना एवं गुणवत्ता में भी सुधार करती है। ढैंचा को हरी खाद के रूप में विशेष महत्व इसलिए प्राप्त है क्योंकि इसमें नाइट्रोजन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती है। विशेषज्ञों के अनुसार एक हेक्टेयर क्षेत्र में ढैंचा की हरी खाद का उपयोग करने से भूमि को लगभग 40 से 50 किलोग्राम नाइट्रोजन प्राकृतिक रूप से प्राप्त हो सकती है। इससे रासायनिक नाइट्रोजन उर्वरकों की आवश्यकता कम होती है और खेती की लागत में भी कमी आती है।
इसके अतिरिक्त ढैंचा मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ाने, मिट्टी की संरचना को बेहतर बनाने, जलधारण क्षमता में वृद्धि करने तथा जड़ों में रहने वाले सूक्ष्म जीवों के माध्यम से वायुमंडलीय नाइट्रोजन के स्थिरीकरण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इससे मिट्टी लंबे समय तक उपजाऊ बनी रहती है और फसल की गुणवत्ता एवं उत्पादन क्षमता में सुधार होता है। कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे फसल चक्र, हरी खाद, उन्नत एवं प्रमाणित बीज, संतुलित उर्वरक प्रबंधन तथा प्राकृतिक खेती की आधुनिक तकनीकों को अपनाएं। इन उपायों से कम लागत में अधिक एवं गुणवत्तापूर्ण उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। साथ ही मिट्टी का स्वास्थ्य भी सुरक्षित रहेगा, जिससे आने वाली पीढ़ियों के लिए कृषि अधिक टिकाऊ और लाभकारी बन सकेगी।
जिले के किसानों द्वारा हरी खाद के रूप में ढैंचा को अपनाने की बढ़ती पहल इस बात का संकेत है कि किसान अब प्राकृतिक एवं वैज्ञानिक खेती की ओर तेजी से अग्रसर हो रहे हैं। उचित फसल प्रबंधन, प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग तथा आधुनिक कृषि तकनीकों के समन्वय से खेती को अधिक लाभकारी, पर्यावरण अनुकूल और आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।

