कोरिया/एमसीबी
(छत्तीसगढ़) |
विशेष संवाददाता Nilesh sony
किसानों और पशुपालकों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से संचालित प्रायवेट कृत्रिम गर्भाधान कार्यकर्ता योजना एवं वत्सो पालन योजना अब गंभीर सवालों के घेरे में आ गई हैं। कोरिया और मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (एमसीबी) जिलों में इन योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर बड़े पैमाने पर अनियमितताओं की चर्चाएं सामने आने लगी हैं।
आरोप है कि योजनाओं के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च दर्शाए गए, लेकिन जमीनी स्तर पर अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं दे रहे हैं।
जानकारी के अनुसार विभिन्न विकासखंडों में कार्यरत निजी कृत्रिम गर्भाधान कार्यकर्ताओं द्वारा प्रतिमाह पशुओं के कृत्रिम गर्भाधान, गर्भधारण तथा जन्मे वत्सों (बछड़ा-बछिया) के आंकड़े विभाग को भेजे जाते रहे हैं।
इन्हीं आंकड़ों के आधार पर योजनाओं की प्रगति रिपोर्ट तैयार की जाती है तथा भुगतान की प्रक्रिया भी पूरी की जाती है। हालांकि अब आरोप लग रहे हैं कि इन आंकड़ों का पर्याप्त भौतिक सत्यापन नहीं किया गया।

आंकड़ों और जमीनी हकीकत में अंतर की चर्चा
स्थानीय स्तर पर जुड़े लोगों और जानकारों का दावा है कि कई क्षेत्रों में विभाग को भेजे गए आंकड़े वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाते। आरोप है कि जिन गांवों में बड़ी संख्या में कृत्रिम गर्भाधान और पशु जन्म के दावे किए गए, वहां उतनी संख्या में पशुधन ही उपलब्ध नहीं है। यदि इन दावों की निष्पक्ष जांच कराई जाए तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं।
क्षेत्र में यह भी चर्चा है कि कागजों में उपलब्धियां दिखाकर योजनाओं को सफल बताया गया, जबकि वास्तविक लाभार्थियों तक लाभ अपेक्षित स्तर पर नहीं पहुंच सका। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं तो मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी धन के संभावित दुरुपयोग का भी प्रश्न खड़ा करेगा।
बिना सत्यापन स्वीकार किए गए आंकड़ों पर सवाल
सबसे गंभीर आरोप यह है कि निजी कृत्रिम गर्भाधान कार्यकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों को विभागीय अधिकारियों ने बिना पर्याप्त जांच-पड़ताल के स्वीकार कर लिया। इसके बाद उन्हीं आंकड़ों के आधार पर योजनाओं की सफलता का दावा किया गया और भुगतान भी जारी किया गया।
जागरूक नागरिकों का कहना है कि यदि विभाग के पास वास्तविक लाभार्थियों, पशुओं तथा जन्मे वत्सों का पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध है तो उसे सार्वजनिक जांच के लिए प्रस्तुत किया जाना चाहिए। इससे योजनाओं की पारदर्शिता बढ़ेगी और उठ रहे संदेहों का भी समाधान होगा।
एमसीबी जिले में भी उठ रहे हैं सवाल
सूत्रों के अनुसार इसी प्रकार की अनियमितताओं की चर्चाएं एमसीबी जिले में भी सामने आ रही हैं। आरोप है कि कई मामलों में संदिग्ध अथवा फर्जी आंकड़ों के आधार पर योजनाओं का क्रियान्वयन दर्शाया गया और शासन से प्राप्त राशि खर्च दिखाकर फाइलों का निपटारा कर दिया गया। हालांकि इन आरोपों की अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
गांव-गांव सत्यापन की मांग तेज
स्थानीय पशुपालकों, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों ने पूरे मामले की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उनका कहना है कि विभागीय मासिक रिपोर्ट के आधार पर गांव-गांव जाकर लाभार्थियों, पशुओं और जन्मे वत्सों का भौतिक सत्यापन कराया जाए।
उनका मानना है कि यदि रिकॉर्ड सही पाए जाते हैं तो विभाग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल स्वतः समाप्त हो जाएंगे, लेकिन यदि अनियमितताएं सामने आती हैं तो जिम्मेदार अधिकारियों एवं संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल
आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या योजनाओं की उपलब्धियां वास्तव में धरातल पर मौजूद हैं, या फिर करोड़ों रुपये की सरकारी राशि कागजी आंकड़ों की भेंट चढ़ गई? इसका उत्तर केवल निष्पक्ष, पारदर्शी और स्वतंत्र जांच से ही सामने आ सकता है।

