Report Nilesh sony
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर देशभर में वृक्षारोपण अभियान, हरित संकल्प और करोड़ों पौधे लगाने के दावे किए जा रहे हैं। केंद्र और राज्य सरकारें बड़े पैमाने पर पौधारोपण कार्यक्रम चला रही हैं तथा पर्यावरण संरक्षण के संदेश दिए जा रहे हैं। देश के कई राज्यों में करोड़ों पौधे लगाने के लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं और जनभागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
लेकिन दूसरी ओर एक बड़ा सवाल खड़ा है—क्या केवल पौधे लगाना ही पर्यावरण संरक्षण है, या फिर मौजूदा जंगलों को बचाना उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है?
देश के विभिन्न हिस्सों में हर वर्ष जंगलों में आग लगने की घटनाएं सामने आती हैं। वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास प्रभावित होता है, जैव विविधता को नुकसान पहुंचता है और हजारों पेड़ आग की भेंट चढ़ जाते हैं। ऐसे समय में पर्यावरणविदों का मानना है कि केवल पौधारोपण की संख्या बताने से अधिक महत्वपूर्ण उन पौधों की सुरक्षा और जीवित रहने की दर सुनिश्चित करना है।
वृक्षारोपण अभियान तभी सफल माना जाएगा जब लगाए गए पौधे वर्षों बाद वृक्ष बनकर खड़े दिखाई दें। कई बार बड़े-बड़े समारोहों में पौधे लगाए जाते हैं, फोटो खिंचती हैं, समाचार प्रकाशित होते हैं, लेकिन बाद में उनकी देखरेख और संरक्षण पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता।
पर्यावरण संरक्षण केवल एक दिन का आयोजन नहीं, बल्कि निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। यदि जंगलों में आग, अवैध कटाई, खनन और अतिक्रमण जैसी समस्याओं पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया, तो पौधारोपण के आंकड़े पर्यावरणीय चुनौतियों का समाधान नहीं कर पाएंगे।


जनता पूछ रही है सवाल
जंगलों में लगने वाली आग के लिए जिम्मेदार कौन?
लगाए गए पौधों में कितने वास्तव में जीवित हैं?
वन संरक्षण की जमीनी निगरानी कितनी प्रभावी है?
क्या पर्यावरण दिवस केवल फोटो और कार्यक्रमों तक सीमित रह गया है?
जंगल बचेंगे या केवल पौधारोपण के आंकड़े बढ़ेंगे?
पर्यावरण की रक्षा केवल पौधे लगाने से नहीं, बल्कि जंगल बचाने से होगी।
जब तक वनों की आग, अवैध कटाई और पर्यावरणीय क्षरण पर कठोर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक हरियाली के दावे अधूरे रहेंगे। देश को आज पौधारोपण के साथ-साथ “वन संरक्षण, वन प्रबंधन और जवाबदेही” की भी उतनी ही आवश्यकता है।
“पेड़ लगाना आसान है, लेकिन जंगल बचाना असली पर्यावरण सेवा है।” 🌳🔥

