Report Nilesh sony
कोरिया/सोनहत:
छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के वन मंडल सोनहत से एक गंभीर प्रशासनिक लापरवाही और कथित मिलीभगत का मामला सामने आया है, जिसने न केवल विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि शासन-प्रशासन की विश्वसनीयता को भी कटघरे में ला खड़ा किया है।
दिनांक 25 फरवरी 2026 को जारी स्थानांतरण आदेश के बावजूद आज तक नव नियुक्त वन परिक्षेत्र अधिकारी (रेंजर) को प्रभार नहीं सौंपा गया है। हैरानी की बात यह है कि एक महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी संबंधित डिप्टी रेंजर उसी पद पर जमे हुए हैं, मानो विभागीय आदेश उनके लिए कोई मायने ही नहीं रखते।
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प्रशासनिक आदेश या कागज़ी औपचारिकता?
यह मामला सीधे-सीधे यह संकेत देता है कि वन विभाग में आदेशों का पालन सिर्फ कागज़ों तक सीमित रह गया है। सवाल उठता है कि जब शासन स्तर से स्पष्ट आदेश जारी हो चुके हैं, तो आखिर किसके संरक्षण में इनका खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है?
क्या यह मान लिया जाए कि विभागीय अनुशासन पूरी तरह से समाप्त हो चुका है? या फिर यह सत्ता और प्रभाव का खेल है, जहां नियमों को ताक पर रखकर अपनी मनमर्जी चलाई जा रही है?

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मंत्री, डीएफओ और जिला प्रशासन पर उठे सवाल
इस पूरे मामले में वन मंत्री केदार कश्यप, जिला प्रशासन और संबंधित डीएफओ की भूमिका भी सवालों के घेरे में है।
यदि यह स्थिति उनकी जानकारी में है, तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
और यदि जानकारी में नहीं है, तो यह प्रशासनिक विफलता का गंभीर उदाहरण है।
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राजनीतिक संरक्षण की आशंका
सूत्रों का दावा है कि यह पूरा मामला बिना किसी “ऊपर के संरक्षण” के संभव नहीं है।
एक डिप्टी रेंजर का आदेश के बावजूद पद पर बने रहना और नव नियुक्त अधिकारी को प्रभार न देना, सीधे-सीधे राजनीतिक हस्तक्षेप या दबाव की ओर इशारा करता है।
यह स्थिति न केवल विभाग की छवि को धूमिल कर रही है, बल्कि यह संदेश भी दे रही है कि सत्ता से जुड़े लोगों के लिए नियम-कानून कोई मायने नहीं रखते।
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जनता और व्यवस्था के बीच बढ़ती खाई
वन विभाग जैसे संवेदनशील विभाग में इस प्रकार की लापरवाही का सीधा असर आम जनता और पर्यावरणीय कार्यों पर पड़ता है।
जब जिम्मेदार अधिकारी ही अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाएं, तो क्षेत्रीय विकास और वन संरक्षण की उम्मीद करना बेमानी हो जाता है।
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स्थानीय स्तर पर बढ़ते असंतोष को देखते हुए यह मामला अब राज्य से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक उठने की संभावना जताई जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, जल्द ही इस संबंध में उच्च अधिकारियों तक शिकायत भेजी जा सकती है।
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कड़ी कार्रवाई की मांग
जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय नागरिकों ने इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है।
साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि यदि दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह प्रशासनिक अराजकता का खतरनाक उदाहरण बन जाएगा।
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कोरिया वन मंडल का यह मामला सिर्फ एक स्थानांतरण विवाद नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल है।
अब देखना यह होगा कि शासन-प्रशासन इस पर कितनी गंभीरता दिखाता है — या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।

