खबर गणेश सोनी/ सिटी रिपोर्टर जिला शहडोल
भारत की सनातन परंपरा, नारी शक्ति की तपस्या और पारिवारिक संस्कारों का प्रतीक वट सावित्री व्रत इस वर्ष विशेष धार्मिक महत्व के साथ मनाया जा रहा है।
वर्षों बाद शनि अमावस्या और वट सावित्री व्रत का दुर्लभ एवं पुण्यदायी संयोग बनने से देशभर के श्रद्धालुओं में गहरी आस्था और उत्साह देखने को मिल रहा है।
देश के विभिन्न राज्यों में सुहागिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, परिवार की सुख-समृद्धि और घर की नकारात्मक शक्तियों से रक्षा के लिए व्रत रखकर वट वृक्ष की पूजा-अर्चना करेंगी। धार्मिक मान्यता है कि वट वृक्ष में त्रिदेवों का वास होता है और इसकी पूजा करने से अखंड सौभाग्य, सुख-शांति तथा जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
सनातन संस्कृति में वट सावित्री व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि नारी के त्याग, समर्पण, विश्वास और परिवार के प्रति अटूट प्रेम का प्रतीक माना जाता है। पुराणों में वर्णित माता सावित्री की तपस्या और उनके दृढ़ संकल्प ने इस व्रत को अमर आस्था का स्वरूप प्रदान किया है।
धर्माचार्यों के अनुसार इस बार शनि अमावस्या के साथ वट सावित्री व्रत का संयोग विशेष फलदायी माना जा रहा है।
श्रद्धा और सात्विक भावना से किए गए पूजन, दान-पुण्य और व्रत से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं तथा परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है।

ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर महानगरों तक मंदिरों और वट वृक्षों के आसपास पूजा की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में पूजन सामग्री के साथ वट वृक्ष की परिक्रमा कर परिवार के कल्याण की कामना करेंगी।
भारत अपनी संस्कृति, संस्कार और आध्यात्मिक परंपराओं के कारण विश्व में अलग पहचान रखता है। ऐसे पर्व केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि परिवार, समाज और संस्कृति को जोड़ने का कार्य भी करते हैं। श्रद्धा और विश्वास से जुड़े इन पर्वों में भारतीय सभ्यता की आत्मा बसती है।

