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शहडोल जिले के ग्राम कुदरी में शासकीय भूमि पर अतिक्रमण का आरोप: पीड़ित ने कलेक्टर से लगाई न्याय की गुहार, प्रशासनिक निष्क्रियता पर उठे सवाल :………….

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शहडोल (मध्य प्रदेश) से विशेष रिपोर्ट: बेनी माधव कुशवाहा जिला रिपोर्टर शहडोल

खेती-किसानी और आवागमन बाधित होने का आरोप, सिविल विवाद के साथ कानून-व्यवस्था का भी मुद्दा बना मामला

शहडोल जिले के जयसिंहनगर तहसील अंतर्गत ग्राम कुदरी में शासकीय भूमि पर कथित अवैध अतिक्रमण का मामला सामने आया है,

जिसमें एक पीड़ित महिला ने जिला कलेक्टर को आवेदन देकर न्याय की गुहार लगाई है।

आवेदन में आरोप लगाया गया है कि ग्राम के ही एक व्यक्ति द्वारा शासकीय भूमि एवं पंचायत भूमि पर जबरन कब्जा कर लिया गया है,

जिससे न केवल निजी भूमि तक पहुंच बाधित हो रही है बल्कि क्षेत्र में तनाव की स्थिति भी उत्पन्न हो गई है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, पीड़िता के नाम दर्ज भूमि खसरा नंबर 496/1/2 एवं संबंधित खातों के सामने स्थित शासकीय भूमि खसरा नंबर 497/1 (रकबा 6.574 हेक्टेयर) पर कथित रूप से 66×96 फीट क्षेत्र में अवैध निर्माण कर कब्जा कर लिया गया है।

आरोप है कि संबंधित व्यक्ति द्वारा वहां झोपड़ी निर्माण के साथ-साथ नींव खुदाई का कार्य कर स्थायी निर्माण की तैयारी की जा रही है, जिससे शासकीय भूमि के अतिक्रमण का गंभीर मामला बनता है।

पीड़िता ने अपने आवेदन में यह भी उल्लेख किया है कि इस अतिक्रमण के कारण उनके खेत तक आने-जाने का मार्ग अवरुद्ध हो गया है,

जिससे खेती-किसानी का कार्य प्रभावित हो रहा है। साथ ही, विवाद की स्थिति बनने पर कथित रूप से गाली-गलौज एवं झूठे मुकदमे में फंसाने की धमकी भी दी जा रही है,

जिससे मामला केवल सिविल विवाद तक सीमित न रहकर कानून-व्यवस्था से भी जुड़ गया है।

गौरतलब है कि इस संबंध में पीड़िता द्वारा 13 जनवरी 2026 को अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) जयसिंहनगर के समक्ष भी शिकायत प्रस्तुत की गई थी,

किंतु अब तक किसी ठोस कार्रवाई के अभाव में प्रशासनिक निष्क्रियता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। स्थानीय स्तर पर ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो विवाद और गहरा सकता है।

शासकीय भूमि पर अतिक्रमण मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता के तहत दंडनीय है। ऐसे मामलों में तहसील प्रशासन एवं राजस्व विभाग को त्वरित सीमांकन, जांच एवं अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई करना अनिवार्य होता है।

यदि शिकायत के बावजूद कार्रवाई लंबित रहती है तो यह प्रशासनिक जवाबदेही पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।

सिविल कोर्ट के दृष्टिकोण से:
यह मामला सिविल प्रकृति का भी है, जिसमें भूमि स्वामित्व, सीमांकन एवं उपयोग अधिकार से जुड़े प्रश्न शामिल हैं।

पीड़ित पक्ष सिविल न्यायालय में वाद दायर कर स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) एवं कब्जा हटाने की मांग कर सकता है।

साथ ही, यदि धमकी एवं उत्पीड़न के आरोप सिद्ध होते हैं तो आपराधिक प्रकरण भी दर्ज हो सकता है।

सकारात्मक पहल की आवश्यकता:
ऐसे मामलों में प्रशासन की त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई न केवल पीड़ित को न्याय दिलाने में सहायक होती है,

बल्कि क्षेत्र में कानून के प्रति विश्वास भी मजबूत करती है।

जिला प्रशासन यदि समयबद्ध जांच कर अतिक्रमण हटाने एवं दोषियों पर कार्रवाई करता है तो यह एक सकारात्मक संदेश होगा।

ग्राम कुदरी का यह मामला प्रशासनिक सतर्कता, राजस्व व्यवस्था की पारदर्शिता और न्यायिक प्रक्रिया की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

अब नजरें जिला प्रशासन पर टिकी हैं कि वह पीड़ित को राहत दिलाने के लिए कितनी शीघ्र और प्रभावी कार्रवाई करता है।

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