📍 सोनहत/कोरिया (छत्तीसगढ़) |
रिपोर्ट: निलेश सोनी
ग्राम पंचायत कैलाशपुर:
छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले से सामने आया प्रधानमंत्री आवास योजना में कथित डिजिटल घोटाला न केवल स्थानीय प्रशासन, बल्कि पूरे देश में लागू कल्याणकारी योजनाओं की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा रहा है।
यह मामला “डिजिटल इंडिया” और “डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर” जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं की जमीनी हकीकत को बेनकाब करता है,
जहां तकनीक का उपयोग पारदर्शिता के बजाय भ्रष्टाचार को ढकने के लिए किया जा रहा है।


क्या है पूरा मामला?
जनपद पंचायत सोनहत के ग्राम पंचायत कैलाशपुर निवासी समय लाल को वर्ष 2025 में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान स्वीकृत हुआ।

लेकिन वास्तविकता यह है कि—
👉 मौके पर निर्माण कार्य की शुरुआत तक नहीं हुई
👉 वहीं सरकारी रिकॉर्ड में मकान को ‘प्लिंथ लेवल’ तक पूर्ण दिखाया गया
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि—
₹40,000 (17 मार्च 2025)
₹55,000 (22 दिसंबर 2025)
कुल ₹95,000 की राशि दो किस्तों में निकाल ली गई, जबकि लाभार्थी के खाते में एक भी रुपया नहीं पहुंचा।
डिजिटल सिस्टम का दुरुपयोग या सुनियोजित लूट?
आरोप है कि पंचायत स्तर पर पदस्थ रोजगार सहायक ने—
फर्जी जियो-टैगिंग के जरिए
किसी अन्य निर्माणाधीन मकान की तस्वीरें अपलोड कर
सिस्टम में फर्जी प्रगति दर्शाई
और इसी आधार पर राशि आहरित कर ली गई।
यह घटना स्पष्ट संकेत देती है कि डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम में मानवीय हस्तक्षेप और मिलीभगत से बड़े पैमाने पर हेराफेरी संभव है।
रिश्वत, धमकी और ‘स्थानीय नेटवर्क’ का दबाव
मामला यहीं खत्म नहीं होता।
पीड़ित के अनुसार—
जब उसने सवाल उठाया, तो उसे डराया-धमकाया गया
आरोप है कि रोजगार सहायक के परिवार से जुड़े व्यक्ति द्वारा
👉 ₹5,000 की रिश्वत मांगी गई
👉 यह तक कहा गया कि “ऊपर तक सेटिंग है, कुछ नहीं होगा”
यह दर्शाता है कि मामला सिर्फ एक कर्मचारी तक सीमित नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली नेटवर्क के संरक्षण में चल रहे संभावित भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है।
ग्राउंड रिपोर्ट में बड़े घोटाले के संकेत
स्थानीय स्तर पर की गई जांच में यह सामने आया है कि—
पंचायत में कई आवास अधूरे हैं
कुछ मामलों में निर्माण मौजूद ही नहीं
लेकिन रिकॉर्ड में भुगतान पूर्ण दर्शाया गया है
इससे आशंका जताई जा रही है कि यह व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संगठित और व्यवस्थित घोटाला हो सकता है।
प्रशासन के लिए बड़ा परीक्षण
जिला प्रशासन ने मामले की जांच के आदेश तो दे दिए हैं, लेकिन अब असली सवाल यह है—
👉 क्या जांच निष्पक्ष और पारदर्शी होगी?
👉 क्या दोषियों तक कार्रवाई पहुंचेगी या निचले स्तर तक सीमित रह जाएगी?
👉 क्या पीड़ित को उसका हक समय पर मिल पाएगा?
प्रशासनिक दृष्टि से गंभीर सवाल
यह प्रकरण कई स्तरों पर चिंताजनक है—
डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल
जियो टैगिंग जैसे तकनीकी उपकरणों की निगरानी में खामी
स्थानीय प्रशासनिक तंत्र में जवाबदेही का अभाव
गरीब हितग्राहियों के अधिकारों का खुला उल्लंघन
यदि इस प्रकार की घटनाएं अनियंत्रित रहीं, तो यह न केवल योजनाओं की साख को नुकसान पहुंचाएंगी, बल्कि सरकार की जनकल्याणकारी नीतियों पर जनता का भरोसा भी कमजोर करेंगी।
पीड़ित की मांग
पीड़ित किसान ने प्रशासन से मांग की है कि—
दोषियों पर एफआईआर दर्ज कर सख्त कार्रवाई हो
उसकी पूरी राशि उसके खाते में वापस दिलाई जाए
पंचायत स्तर पर सभी आवासों की स्वतंत्र और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए
निष्कर्ष: एक मामला नहीं, सिस्टम की चेतावनी
यह घटना सिर्फ एक पंचायत या एक जिले का मामला नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि यदि समय रहते निगरानी तंत्र को मजबूत नहीं किया गया, तो डिजिटल योजनाएं भी भ्रष्टाचार का नया माध्यम बन सकती हैं।
“डिजिटल इंडिया” की सफलता केवल तकनीक से नहीं, बल्कि ईमानदार क्रियान्वयन और जवाबदेही से तय होगी—वरना ऐसे घोटाले शासन की जड़ों को भीतर से खोखला करते रहेंगे।

