📍 सोनहत/कैलाशपुर | विशेष रिपोर्ट: नीलेश सोनी
कभी ग्रामीणों के लिए रोजगार, प्रशिक्षण और हरियाली का प्रतीक रहा कैलाशपुर का रेशम केंद्र आज सरकारी लापरवाही और प्रशासनिक उदासीनता का जीता-जागता उदाहरण बन चुका है।
रेशम विभाग द्वारा करोड़ों रुपये की लागत से स्थापित यह केंद्र अब पूरी तरह वीरान पड़ा है, जहां न अधिकारी दिखाई देते हैं और न ही कोई गतिविधि।


जहां कभी रेशम उत्पादन, प्रशिक्षण कार्यक्रम और ग्रामीणों की भागीदारी से क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियां संचालित होती थीं,
वहीं आज टूटती दीवारें, जर्जर भवन और सूना परिसर इस बात की गवाही दे रहे हैं कि योजनाएं जमीन पर दम तोड़ चुकी हैं।




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⚠️ जमीनी हकीकत: बदइंतजामी की पूरी तस्वीर
वर्षों से अधिकारियों की नियमित अनुपस्थिति
कर्मचारियों की भारी कमी और जवाबदेही शून्य
रखरखाव और सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह ठप
करोड़ों की परियोजना बिना निगरानी के बर्बादी की कगार पर
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📉 “विकास” से “विनाश” तक का सफर
रेशम केंद्र का मूल उद्देश्य ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनाना और स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन करना था। लेकिन आज यह केंद्र खुद अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है।
सरकारी योजनाओं का यह हश्र साफ दिखाता है कि कागजों में विकास और जमीन पर सच्चाई में कितना बड़ा अंतर है।
🗣️ प्रशासन से सीधे सवाल
क्या जिम्मेदार अधिकारियों ने कभी इस केंद्र का निरीक्षण किया?
करोड़ों की लागत से बनी इस योजना का लाभ आखिर किसे मिला?
क्या यह लापरवाही जानबूझकर नजरअंदाज की जा रही है?
क्यों नहीं तय हो रही जवाबदेही और कार्रवाई?
📢 ग्रामीणों का आक्रोश और मांग
स्थानीय ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
उनका कहना है कि यदि जल्द ही इस केंद्र को पुनर्जीवित नहीं किया गया, तो यह पूरी तरह समाप्त हो जाएगा और क्षेत्र के लोगों का एक महत्वपूर्ण रोजगार साधन हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।
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🔴 सवाल. ?
“कैलाशपुर रेशम केंद्र अब एक बड़ा सवाल बन चुका है—क्या सरकारी योजनाएं सिर्फ कागजों और उद्घाटनों तक ही सीमित रह जाएंगी, या जिम्मेदारों पर कभी कार्रवाई भी होगी?”

