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“प्रधानमंत्री आवास में डिजिटल घोटाला: बिना नींव बने ही ₹95 हजार हजम, रोजगार सहायक पर रिश्वत और फर्जीवाड़े के गंभीर आरोप”पंचायत कैलाशपुर……..

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📍 सोनहत/कोरिया (छत्तीसगढ़) | विशेष रिपोर्ट. Nilesh Sony…….

हेडलाइन…

“छत्तीसगढ़ के कोरिया में ‘जियो टैग’ के नाम पर खेल, गरीब किसान को धमकाकर मांगे ₹5 हजार—पूरे पंचायत में घोटाले की आशंका”

छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले से प्रधानमंत्री आवास योजना में भ्रष्टाचार का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है,

जिसने शासन की पारदर्शिता और डिजिटल सिस्टम की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जनपद पंचायत सोनहत के ग्राम पंचायत कैलाशपुर में एक गरीब किसान के हक की राशि फर्जीवाड़े के जरिए निकाल लेने का आरोप लगा है।

क्या है मामला?

ग्राम कैलाशपुर निवासी समय लाल (पिता स्व. पवन साय) को वर्ष 2025 में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवास स्वीकृत हुआ था।

लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि उसके घर की एक ईंट तक नहीं रखी गई, जबकि सरकारी रिकॉर्ड में निर्माण कार्य ‘प्लिंथ लेवल’ तक पूरा दिखा दिया गया।

आरोप है कि पंचायत के रोजगार सहायक ने फर्जी जियो टैग और किसी अन्य निर्माणाधीन मकान की तस्वीरों का उपयोग कर दो किस्तों में कुल ₹95,000 की राशि निकाल ली—

पहली किस्त: ₹40,000 (17 मार्च 2025)

दूसरी किस्त: ₹55,000 (22 दिसंबर 2025)

यह पूरी राशि कथित तौर पर किसी अन्य खाते में ट्रांसफर कर दी गई, जबकि पीड़ित के खाते में एक भी रुपया नहीं पहुंचा।

⚠️ डिजिटल हेराफेरी और दबंगई का गठजोड़

मामले की जांच में यह भी सामने आया है कि जब समय लाल ने अपने आवास के निर्माण को लेकर सवाल उठाया, तो उसे डराया-धमकाया गया। आरोप है कि रोजगार सहायक के पति, जो शिक्षक हैं, ग्रामीणों पर दबाव बनाकर ₹5,000 की रिश्वत मांगते हैं।

🗣️ पीड़ित का दर्द:
“साहब, मेरे घर की तो नींव भी नहीं पड़ी, लेकिन कागजों में पूरा पैसा निकल गया।

जब पूछने गया तो कहा—5 हजार दो, तभी काम होगा… नहीं तो कलेक्टर भी कुछ नहीं कर पाएंगे।”

🔍 ग्राउंड रिपोर्ट: एक नहीं, कई मामलों में गड़बड़ी

स्थानीय स्तर पर की गई पड़ताल में संकेत मिले हैं कि यह सिर्फ एक मामला नहीं है।

पंचायत में कई ऐसे आवास सामने आए हैं जो अधूरे हैं या धरातल पर मौजूद ही नहीं हैं,

लेकिन कागजों में पूरी राशि आहरित हो चुकी है। इससे एक बड़े संगठित घोटाले की आशंका जताई जा रही है।

🏛️ कलेक्टर से न्याय की गुहार

पीड़ित किसान अब न्याय के लिए जिला कलेक्टर कार्यालय के चक्कर काट रहा है।

उसने मांग की है कि—

दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो

उसके खाते में आवास की पूरी राशि वापस दिलाई जाए

पंचायत स्तर पर सभी आवासों की निष्पक्ष जांच कराई जाए

प्रशासन की कार्रवाई पर नजर

जिला प्रशासन ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच के आदेश दे दिए हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या सिस्टम इस गरीब किसान को उसका हक दिला पाएगा, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?

“डिजिटल इंडिया” के दौर में यदि जियो टैगिंग जैसे तकनीकी सिस्टम का दुरुपयोग कर गरीबों के अधिकार छीने जा रहे हैं, तो यह केवल भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सीधा हमला है।

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