Home छत्तीसगढ़ *महुआ के नाम पर गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान* *के जंगलों में आग*...

*महुआ के नाम पर गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान* *के जंगलों में आग* *वन परिक्षेत्र सोनहत के जंगलों मे बांस के वन राख*—……………

35
0

Report Nilesh sony…………

📍 सोनहत/कोरिया (छत्तीसगढ़) से बड़ी खबर 

गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान और सोनहत वन मंडल के दामुज-लब्जी बीट के आसपास एक गंभीर पर्यावरणीय संकट सामने आया है।

यहां बड़े पैमाने पर लगाए गए बांस के वृक्ष भीषण आग की चपेट में आकर पूरी तरह जलकर खाक हो गए हैं।

स्थानीय सूत्रों के अनुसार, यह आग प्राकृतिक नहीं बल्कि मानवीय लापरवाही और जानबूझकर लगाई गई आग का नतीजा है। बताया जा रहा है कि महुआ बीनने के लिए जंगलों में आग लगा दी जाती है, जिससे सूखी पत्तियां साफ हो जाएं और महुआ इकट्ठा करना आसान हो सके।

🌳 वन विभाग का कड़ा रुख

वन विभाग के अधिकारियों ने इस घटना को गंभीर लापरवाही और दंडनीय अपराध बताया है। विभाग का कहना है कि:

इस तरह की घटनाओं से वन संपदा, जैव विविधता और औषधीय वनस्पतियों को भारी नुकसान होता है

बांस जैसे महत्वपूर्ण पौधे, जो पर्यावरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था दोनों के लिए जरूरी हैं, पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं

आग से वन्यजीवों के आवास भी खतरे में पड़ जाते हैं

वन विभाग ने संकेत दिए हैं कि दोषियों की पहचान कर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

⚠️ बार-बार दोहराई जा रही खतरनाक प्रवृत्ति

आसपास के क्षेत्रों से लगातार ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं, जिससे यह स्पष्ट है कि यह एक संगठित और आदतन लापरवाही बन चुकी है।

विशेषज्ञों का कहना है कि हर साल महुआ सीजन में आग लगाने की घटनाएं बढ़ जाती हैं, लेकिन रोकथाम के उपाय नाकाफी साबित हो रहे हैं।

🏛️ राजनीतिक सवाल भी तेज

यह मामला अब राजनीतिक रूप लेता जा रहा है। विपक्ष ने सरकार और वन विभाग पर सवाल उठाए हैं:

क्या वन सुरक्षा सिर्फ कागजों तक सीमित है?

जंगलों की सुरक्षा के लिए जमीनी स्तर पर निगरानी क्यों कमजोर है?

बार-बार चेतावनी के बावजूद सख्त कार्रवाई क्यों नहीं?

वहीं, सत्तापक्ष का कहना है कि वन संरक्षण के लिए लगातार अभियान चलाए जा रहे हैं और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।

 

🔥 पर्यावरण पर गहरा असर

जंगल की दुर्लभ जड़ी-बूटियां और औषधीय पौधे जलकर नष्ट

मिट्टी की उर्वरता में कमी

वन्यजीवों के जीवन पर संकट

लंबे समय तक पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान

महुआ बीनने की परंपरा अब पर्यावरण के लिए खतरा बनती जा रही है। यदि समय रहते इस पर सख्ती नहीं हुई, तो आने वाले वर्षों में जंगलों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है।

👉 अब देखना यह होगा कि वन विभाग और सरकार इस “आग के खेल” पर कब तक लगाम लगा पाती है, या फिर हर साल ऐसे ही जंगल जलते रहेंगे।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here