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सरगुजा/CG : गौठान बंद तो क्या हुआ! ग्रामीणों ने खुद बनाई मिसाल — अपने दम पर शुरू किया गौधाम……….

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जहां एक ओर प्रदेशभर में कई जगहों पर गौठान योजनाएँ बंद या निष्क्रिय पड़ी हैं, वहीं सरगुजा जिले के एक छोटे से गांव ने सरकार को नया सबक दे दिया है। जब प्रशासन ने गौठान बंद कर दिया, तो ग्रामीणों ने कहा — “गाय हमारी, जिम्मेदारी भी हमारी!” और फिर शुरू हुआ अपने ही बलबूते गौधाम (स्वयं संचालित गौठान) का निर्माण।

ग्रामीणों की एकजुटता बनी मिसाल

गांव के युवाओं, महिलाओं और बुजुर्गों ने मिलकर तय किया कि अब वे बाहरी मदद की उम्मीद नहीं करेंगे।
किसी ने मिट्टी दी, किसी ने बांस और लकड़ी, तो किसी ने अपने हाथों से गौशाला की दीवारें खड़ी कर दीं।
महिलाओं के स्व-सहायता समूहों ने चारा, गोबर से दीये और जैविक खाद बनाना शुरू कर दिया।
अब यह “गौधाम” न सिर्फ गायों का आसरा है, बल्कि गांव की आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन चुका है।

गांव के किसान रामलाल यादव ने बताया — “गौठान बंद हुआ तो लगा जैसे हमारी गायें बेघर हो गईं। हमने तय किया कि चाहे सरकार मदद करे या न करे, अपने गांव की गायों को अब खुद संभालेंगे।” महिलाओं ने बताया कि अब वे गोबर से दीये, गमले और खाद बेचकर कमाई भी कर रही हैं। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई जान मिल गई है।

गौधाम बना आत्मनिर्भरता का केंद्र

नए बने इस गौधाम में अब करीब 40 से अधिक गायें हैं। ग्रामीण बारी-बारी से चारा-पानी की जिम्मेदारी निभाते हैं।
यहां गोबर से वर्मी कम्पोस्ट खाद बनाई जा रही है, जिसे स्थानीय किसान अपनी फसलों में इस्तेमाल कर रहे हैं।
गांव के बच्चे भी सुबह-शाम गायों की देखभाल में हाथ बंटा रहे हैं।

इस पहल में किसी भी सरकारी फंड या सहायता का उपयोग नहीं हुआ। यह पूरी तरह ग्रामीणों की स्वैच्छिक मेहनत और एकजुटता से तैयार हुआ है। गांव के लोग कहते हैं — “जब हम सब साथ हों, तो कोई काम असंभव नहीं।”

प्रशासन भी हैरान, अब कर रहा पुनः निरीक्षण की तैयारी

स्थानीय प्रशासन ने ग्रामीणों की इस पहल को सराहा है और अब वहां जाकर पुनः निरीक्षण करने की बात कही है।
संभावना जताई जा रही है कि भविष्य में इस “ग्राम-प्रेरित गौधाम” को मॉडल प्रोजेक्ट के तौर पर अपनाया जा सकता है।

सरगुजा के इन ग्रामीणों ने साबित कर दिया — “योजना बंद हो सकती है, लेकिन संकल्प नहीं!” जहां सरकारें फाइलों में अटकी रहीं, वहां गांव के लोगों ने अपनी मेहनत से एक नई शुरुआत कर दी। यह कहानी सिर्फ गायों की नहीं, बल्कि उस गांव की जागरूकता और आत्मगौरव की है, जिसने कहा — “हम खुद अपनी सरकार हैं!”

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