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बैकुण्ठपुर/कोरिया : भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरा पीजी कॉलेज, जांच की मांग ?…………..

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जिला मुख्यालय के शासकीय रामानुज प्रताप सिंहदेव स्नात्तकोत्तर महाविद्यालय में पूर्व प्राचार्य के कारनामों का खुलासा सामने आया है। जहां लगभग 33 वर्षों से जिला मुख्यालय में स्थित इस स्नात्तकोत्तर महाविद्यालय में पूर्व प्राचार्य डॉ. अखिलेश चंद्र गुप्ता ने लगभग 26 वर्षों तक अपनी दादागीरी और गुंडागर्दी के बल पर भ्रष्टाचार का खेल खेला। यहां तक कि, पूर्व प्राचार्य डॉ. अखिलेश चंद्र गुप्ता ने अपने लंबे कार्यकाल के दौरान महाविद्यालय में अपनी मनमानी भी की। उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग करके भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया और महाविद्यालय की छवि खराब की।

बता दें कि, जब इस संबंध में अम्बिकापुर कमिश्नर महोदय जी से संपादक जी की बातचीत हुई। तो उन्होंने वशिष्ठ टाइम्स समाचार प्रकाशन की सराहना की और कहा कि पूर्व प्राचार्य किसकी अनुमति से पीजी कॉलेज पहुंचे और क्यों ? कमिश्नर महोदय ने यह भी सवाल उठाया कि पूर्व प्राचार्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज क्यों नहीं कराई गई, जबकि बिना अनुमति के महाविद्यालय में घुसकर दस्तावेजों को जला दिया, यह किसने निर्देश से जलाया गया ? इससे यह साबित होता है कि वर्तमान में जितने भी व्याख्याता हैं, उनकी भी मिली-जुली भूमिका हो सकती है। इसलिए इस मामले में गहन जांच की आवश्यकता है।

मिली जानकारी के अनुसार, पूर्व प्राचार्य द्वारा कैशबुक को भरना और खरीदी-बिक्री के बारे में लोगों में चर्चा है उनका मानना है कि, उनके शासनकाल में महाविद्यालय का करोड़ों का घोटाला करना ही उनका काम रहा है। साथ ही पूर्व प्राचार्य पर आरोप है कि उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग करके महाविद्यालय के धन का हेराफेरी किया। और उन्होंने कैशबुक में काट-पीट करके और कूटरचना करके भ्रष्टाचार को चरम सीमा तक पहुंचाया। लोगों का कहना है कि पूर्व प्राचार्य ने कांग्रेस कार्यालय में एक दुकान भी खरीदा है, जिसकी अनुमानित कीमत लगभग 20 लाख रुपये है। इसके अलावा, उन्होंने अपने वर्तमान मकान के बगल में भी एक जमीन खरीदा है और भी सैकड़ों एकड़ जमीन खरीदी गई है। सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेजों से पता चलता है कि पूर्व प्राचार्य ने महाविद्यालय के कागजातों में हेराफेरी की है। जो कि इन दस्तावेजों में कैशबुक में काट-पीट और कूटरचना के सबूत मिले हैं।

पूर्व प्राचार्य की मनमानी

सोचने वाली बात है कि स्नात्तकोत्तर महाविद्यालय का खाता यूको बैंक में था, तो उस खाते को इंडियन ओवरसीज बैंक में किसके दिशा-निर्देश पर खोला गया ? क्या पूर्व प्राचार्य ने स्नात्तकोत्तर महाविद्यालय को अपनी पैतृक संपत्ति बना लिया था ? यहां तक कि, उनके अण्डर में चार और महाविद्यालय थे और इस महाविद्यालय से सभी महाविद्यालयों की अर्थव्यवस्था उनके हाथ में ही थी। बताया जा रहा है कि, पूर्व प्राचार्य ने अपने सगे संबंधियों को भी सहयोग करने के लिए अपने पद का दुरुपयोग किया। उन्होंने अपने प्रभाव का उपयोग करके अपने संबंधियों को भी लाभ पहुंचाया है। अब सोचने वाली बात है कि पूर्व प्राचार्य द्वारा जितनी भी संपत्ति खरीदी गई है, वह किसके नाम और किसके आदेश पर खरीदी गई है ?

पूर्व प्राचार्य के पत्नी की भूमिका 

पूर्व प्राचार्य की पत्नी प्रिति गुप्ता जो कि पोड़ी बचरा महाविद्यालय में प्राचार्य के पद पर कार्यरत हैं और उन्हें बैकुण्ठपुर महाविद्यालय में भी कार्यभार दिया गया है। एक प्राचार्य को दो लाख 20 हजार रुपये वेतन मिलता है, तो दोनों महाविद्यालय के हिसाब से 4 लाख 40 हजार लगभग मिलते होंगे। लेकिन इसके बावजूद भी पूर्व प्राचार्य और उनकी पत्नी ने भ्रष्टाचार करने से नहीं हिचकिचाया। सोचने वाली बात है कि, जो अकुट सम्पत्ति को खरीदा गया है क्या अपने विभाग से उन्होनंे अनुमति लिया है या नहीं ? और यह सम्पत्ति किसके नाम से है ? जबकि पूर्व प्राचार्य के कोई भी संतान नहीं। तो आखिर उनकी सभी सम्पत्तियां किसके नाम पर है यह जांच का विषय है। साथ ही इन सभी मामले में जांच की आवश्यकता है ताकि यह पता चल सके कि पूर्व प्राचार्य ने अपने पद का दुरुपयोग करके कितना नुकसान पहुंचाया है। यह समाचार प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रकाशित किया जा रहा है।

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