मुख्यालय जांजगीर चांपा में कलेक्टर की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं, जहां भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अक्षमता को देखा जा रहा हैं। कुछ लोगों का मानना है कि, कलेक्टर जीरो हो गए हैं और जिले की स्थिति खराब हो रही है। जानकार सूत्र बताते है कि, सभी अधिकारी नदारद रहते है। अधिकारियों का कहना है कि, भीषण गर्मी में अपनी जान जोखिम में डालना मुश्किल है, ऐसे में यह अधिकारी नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं और अपने विभागों से नदारद रहते हैं। इस तरह की मानसिकता से आम जनता को परेशानी हो रही है और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, एक पत्रकार जो खुद को एक संगठन का सचिव बताता है, वह अधिकारियों पर हावी हो रहा है। साथ ही कृषि विभाग समेत अन्य विभागों में अपनी दबंगई दिखाता है और खुद को बड़ा पत्रकार बतलाता है। जानकार सूत्र बताते है कि, वह व्यक्ति हर महीने हर विभागों से लाखों रुपये निकालता है और कृषि विभाग के संचालक को अपने इशारों पर नचाता है। इस तरह के कारनामों से प्रशासन और पत्रकारिता जगत दोनों की साख खराब हो रही है। मालूम नहीं होता कि, ये गुंडागर्दी पत्रकारिता के बल पर है या शारीरिक बल पर ? इस संबंध को लेकर जनसंपर्क अधिकारी को भी अवगत कराया गया है कि, यह व्यक्ति पत्रकार है या गुंडा ? पुलिस प्रशासन को ऐसे लोगों पर कार्रवाई करनी चाहिए जो पत्रकारिता की आड़ में गुंडागर्दी करते हैं। इसके अलावा, कुछ लोगों को मात्र 500 रुपये प्रति माह देकर रिक्शा चालकों को भी पत्रकार की आईडी दी जा रही है, जिससे मीडिया की साख खराब हो रही है। इस तरह के फर्जी पत्रकारों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए। नही ंतो पत्रकारिता का चौथा स्तम्भ भी नहीं रहेगा। वहीं मीडिया की साख खराब करने वाले फर्जी पत्रकारों पर कार्रवाई होनी चाहिए। जो कि 500 रुपये में मीडिया आईडी और माइक बेचने वाले लोगों की वजह से ईमानदार पत्रकारों की धज्जियां उड़ रही हैं।
मिली जानकारी के अनुसार, कुछ फर्जी पत्रकारों ने शिक्षा विभाग में फर्जी नियुक्ति पाई है और मेडिकल स्टोर खोलने के नियमों का उल्लंघन भी कर रहे हैं। साथ ही अपनी भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए दूसरे की भ्रष्टाचार को उजागर कर रहे हैं। जानकार सूत्र बताते है कि, पत्रकारिता की आड़ में अपनी मां की फर्जी नियुक्ति और मेडिकल स्टोर को छुपाने वाले लोग भी हैं। यहां तक कि, आलू चाप और मंगौड़ी बनाने वाले भी पत्रकार बन गए हैं। और भारत सरकार के नियमों के अनुसार वेब पोर्टल वाले संपादक लिखने के अधिकारी नहीं हैं। फिर भी अपने आप को संपादक बतलाते है। ऐसे फर्जी पत्रकारों पर कार्रवाई होनी चाहिए।
लोगों में चर्चाऐं है कि, पत्रकारिता की आड़ में नशीली पदार्थ बेचने वाले लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए। और कुछ लोग पत्रकार के नाम पर गांजे की पुड़िया बेच रहे हैं और संगठन के सदस्य भी बने हुए हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि, यह संगठन पत्रकारों का है या अपराधियों का ? जो कि इन लोगों को नशीली पदार्थ बेचने का अधिकार किसने दिया ? यह जांच का विषय है और पुलिस प्रशासन को इस मामले में कार्रवाई करनी चाहिए।



