Home कोरिया बैकुण्ठपुर/कोरिया : सुशासन तिहार बना कुशासन तिहार ?………….

बैकुण्ठपुर/कोरिया : सुशासन तिहार बना कुशासन तिहार ?………….

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जिला मुख्यालय बैकुण्ठपुर में वशिष्ठ टाइम्स समाचार पत्र संपादक के द्वारा नगर पालिका एवं राजस्व विभाग के कई कारनामों को उजाकर करते रहे है। जिसमें श्रीमती उषा जी की शिकायत भी सम्मिलित है। जानकार सूत्र बताते है कि, श्रीमती उषा के द्वारा अपने निस्तार की जमीन नाली का निर्माण हेतु आवेदन दिया गया था, पर नगर पालिका के अध्यक्ष, सीएमओ एवं इन्जीनियर कुशवाहा द्वारा लापरवाही बरती जा रही है। जिसका फोन नंबर 7999287193 जो कि कुशवाहा इन्जीनियर का है इस व्यक्ति को बार-बार फोन करके बोला जाता है कि, हमारा काम रूका हुआ, परंतु कुशवाहा इन्जीनियर द्वारा बोला जाता है कि, मैं कलेक्टर महोदया जी के यहां हूँ, तो कभी मीटिंग में हूँ तो कभी रायपुर में हूँ बोलते-बोलते महीनों बीत चुके है, पर अभी तक कोई काम नहीं हुआ। क्योंकि अनावेदक दिनेश चद्र गुप्ता के द्वारा बाईसागर तालाब में निर्माण को लेकर संपादक के परिवार को प्रताड़ित किया जा रहा है यहां तक कि, समस्त रिस्तेदार मारपीट को तैयार रहते है।

वहीं धारा 32 में राजस्व विभाग को अधिकार है कि, नवनिर्माण मकान को तुरंत रूकवाये व धारा 33 जिसमें सुखाचार अधिनियम में आने जाने व पानी का निस्तार रोका नहीं जा सकता। इन सभी बिन्दुओं को लेकर कई बार कलेक्टर महोदया श्रीमती चंदन त्रिपाठी जी को शिकायत पत्र दिया गया। पर आज भी नजर-अंदाज किया जा रहा है। तथा दिनेश गुप्ता के परिवार व अन्य साथियों द्वारा संपादक के परिवार को गाली-गलौज व जान से मारने का धमकी दिया गया। इसकी भी शिकायत पुलिस अधीक्षक व थाना प्रभारी को किया गया है परंतु किसी का क्या खौफ जो हमारी सुनेंगे ? आखिर क्यों पुलिस अधीक्षक व कलेक्टर कई बार शिकायत करने पर भी नहीं सुनते ? ऐसा संदेहस्पद होता है कि, प्रशासन के ऊपर किसी नेता का या पैसे का दबाव है ? क्या कोरिया प्रशासन कोई अप्रिय घटना का इंतजार तो नहीं कर रही है ?

लोगों में चर्चा है कि, पड़ोस में एमसीबी कलेक्टर भी है जिसका तावभाव देखा जाये तो किसी भी शिकायत को कार्यवाही करने में आबादा हो जाते है जो कि प्रशंसनीय है। वहीं हमारे कोरिया कलेक्टर को लेकर कहा जाता है कि, कम-से-कम किसी भी शिकायत को संज्ञान में तो लेना चाहिए। एक जिला का मुख्या होकर भी एक संपादक के ऊपर चारो ओर से प्रताड़ित किया जा रहा है उस पर कार्यवाही क्यों नहीं की जाती ? क्या कभी भी संपादक के मकान बरसात में ढह गया तो इसका प्रशासन खामयाजा भुगतेगा ? वहीं ठेकेदार आशिष डबरे से लगभग 30 सालों से विवाद चल रहा है उसी को ठेका दे दिया गया है क्या नाली की गुणवक्ता सही बना पायेगा ? क्योंकि राजस्व विभाग में न्याय नहीं पैसा चलता है ? जैसे- आवेदक के द्वारा शिकायत किया गया था तो आरआई, तहसीलदार, पटवारी और नायब तहसीलदार द्वारा आवेदक को नहीं बुलाया गया। जिसमें तालाब में लगभग 16 -17 लोग खरीदे हुए है उनको गवाह बना लिया गया व आवेदक के प्रतिद्वंदी प्रभाकर डबरे को उसको गवाह बनाया गया, यह क्या न्याय संगत है ? क्या प्रशासन को अपने मन मुताबिक प्रतिवेदन बनाने का अधिकार है ? यह पैसे या किसी नेता के दबाव में यह सब काम हो रहा है ? क्योंकि जानकार सूत्र बताते है तहसीलदार, आरआई और पटवारी सब पैसे में कुछ भी करने को तैयार हो जाते है। आज भी तहसील में देखा जाये तो दलालों का भरमार है। जैसे – वहां के कर्मचारी लगभग 15-20 सालों से एक ही पद पर जमे हुए है यह प्रशासन को नहीं दिख रहा है क्या ? अब इसे सुशासन कहेंगे या कुशासन ?

लोगों में चर्चाऐं है कि, जब एक समाचार पत्र के संपादक अपनी आवाज उठाने में नाकाम हो रहे है तो आम जनता के साथ क्या हाल होता होगा ? क्योंकि कुछ नेताओं और प्रशासन की झूठी बापबाई प्रकाशित करने वाले ही अधिकारियों के बीच मंे अपना व्यापार चला रहे है। नगर पालिका में काम नहीं पैसे की होली खेली जा रही है यह जाचं का विषय है।

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