Report Nilesh sony
कोरिया (छत्तीसगढ़) से एक मार्मिक और चुभती हुई तस्वीर सामने आई है, जहां एक गरीब बीपीएल परिवार सरकारी योजनाओं के भरोसे जीवन काटने को मजबूर है, लेकिन सिस्टम की सुस्ती और संवेदनहीनता उसकी उम्मीदों पर भारी पड़ रही है।
आवेदन में साफ लिखा गया है कि भीषण गर्मी के कारण बीपीएल परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है, और ऐसे हालात में AC कूलर जैसे साधन उनके लिए सपना बन चुके हैं।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है —
👉 क्या गरीब को राहत देने वाली योजनाएं सिर्फ कागजों तक सीमित हैं?
👉 क्या “सुशासन” केवल आयोजन बनकर रह गया है, समाधान नहीं?
* व्यवस्था पर सीधा सवाल
जब देश में विकास और डिजिटल इंडिया की बात होती है, तब जमीनी हकीकत यह है कि एक गरीब नागरिक को कूलर जैसी बुनियादी राहत के लिए भी आवेदन करना पड़ रहा है।
सरकार की योजनाएं अगर वास्तव में ज़मीनी स्तर तक पहुंचतीं, तो आज यह आवेदन लिखने की नौबत ही नहीं आती।
⚡ ऊर्जा विभाग की जवाबदेही तय हो
आवेदक ने स्पष्ट मांग की है कि शासन की योजना के अंतर्गत AC कूलर में सब्सिडी प्रदान की जाए, ताकि वह भीषण गर्मी में राहत पा सके।
लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं होना, विभागीय लापरवाही को उजागर करता है।

`यह सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं है —
यह पूरे देश के उन करोड़ों गरीब परिवारों की सच्चाई है,
जो आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए सिस्टम के सामने हाथ फैलाने को मजबूर हैं।
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अगर “सुशासन तिहार” जैसे मंच पर भी गरीब की आवाज सिर्फ आवेदन बनकर रह जाए,
तो यह लोकतंत्र के उस चेहरे को दिखाता है जहां
योजनाएं हैं, पर पहुंच नहीं
घोषणाएं हैं, पर क्रियान्वयन नहीं
अब देखना यह है कि
ऊर्जा विभाग इस आवाज को सुनता है या इसे भी फाइलों में दबा दिया जाएगा।

