विशेष रिपोर्ट | Ganesh Soni City reporter jila shehdol
देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET-UG को लेकर उठे विवाद और परीक्षा रद्द होने की खबरों ने लाखों छात्रों और अभिभावकों को गहरे मानसिक आघात में डाल दिया है।
एक वर्ष तक दिन-रात मेहनत करने वाले विद्यार्थियों के सपनों पर अचानक अनिश्चितता का काला साया छा गया है। गरीब परिवारों ने मजदूरी कर, कर्ज लेकर और अपनी जरूरतें काटकर बच्चों को कोचिंग दिलाई, लेकिन अब पूरा भविष्य सवालों के घेरे में दिखाई दे रहा है।
ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर महानगरों तक विद्यार्थियों में भारी आक्रोश है। शहडोल, रीवा, सीधी सहित मध्यप्रदेश के कई जिलों में छात्र और अभिभावक यह सवाल उठा रहे हैं कि आखिर कुछ लोगों की कथित लापरवाही,
पेपर लीक या परीक्षा प्रणाली की खामियों का खामियाजा पूरे देश के मेहनती बच्चों को क्यों भुगतना पड़े?

विद्यार्थियों का कहना है कि उन्होंने तपती गर्मी, आर्थिक संकट और मानसिक दबाव के बीच पूरी निष्ठा से तैयारी की थी। कई छात्र ऐसे हैं जिनके माता-पिता ने खेत बेच दिए, मजदूरी बढ़ा दी या कर्ज लेकर कोचिंग फीस जमा की।
अब परीक्षा निरस्त होने की आशंका और जांच प्रक्रिया ने उनके आत्मविश्वास को झकझोर कर रख दिया है।
छात्र संगठनों और अभिभावकों ने मध्यप्रदेश शासन, मुख्यमंत्री, शिक्षा विभाग, तथा शहडोल-रीवा संभाग के जनप्रतिनिधियों से मांग की है कि इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच कराई जाए और यदि किसी प्रकार की गड़बड़ी हुई है तो दोषियों को तत्काल गिरफ्तार कर कठोर दंड दिया जाए।
साथ ही यह भी मांग उठ रही है कि ईमानदारी से परीक्षा देने वाले छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ न हो तथा पारदर्शी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए ताकि मेहनत करने वाले विद्यार्थियों का भरोसा देश की शिक्षा प्रणाली पर कायम रह सके।
राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने भी सवाल उठाया है कि यदि देश की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षाएं ही सुरक्षित नहीं रह गईं, तो युवाओं का भविष्य किस दिशा में जाएगा?
बार-बार परीक्षा विवाद सामने आना देश की शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक तंत्र पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।
अब निगाहें केंद्र सरकार, परीक्षा एजेंसियों और राज्य सरकारों पर टिकी हैं कि वे छात्रों के हित में क्या बड़ा निर्णय लेते हैं। देशभर के लाखों विद्यार्थी सिर्फ न्याय, पारदर्शिता और अपने भविष्य की सुरक्षा की मांग कर रहे हैं।

