कोरिया/छत्तीसगढ़।खबर Nilesh Sony……
कलेक्टर चंदन त्रिपाठी के मार्गदर्शन और बाल्मिक दुबे के प्रयास—इतिहास, संस्कृति और सेवा कार्यों को जोड़ने की कोशिश
छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के दूरस्थ क्षेत्र रामगढ़ (सालगवा-नटवाही) से एक ऐसी पहल सामने आई है, जो न केवल स्थानीय इतिहास को सहेजने की दिशा में महत्वपूर्ण है,
बल्कि सामाजिक और धार्मिक (धर्म-कर्म) गतिविधियों के माध्यम से समाज को जोड़ने का भी कार्य कर रही है।
101 वर्षीय श्री गुलाबचंद जी के साक्षात्कार ने जहां एक ओर क्षेत्र के जीवंत इतिहास को सामने लाया, वहीं दूसरी ओर प्रशासन और समाजसेवियों की भूमिका भी चर्चा में आ गई है।
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इतिहास और अनुभव का संगम
सामाजिक कार्यकर्ता बाल्मिक दुबे द्वारा लिया गया यह साक्षात्कार केवल एक औपचारिक बातचीत नहीं, बल्कि बीते एक सदी के अनुभवों का दस्तावेज़ है।

गुलाबचंद जी ने अपने जीवन के अनुभवों में गांव की परंपराएं, प्राकृतिक जीवनशैली, धार्मिक आस्थाएं और पुराने समय की सामाजिक संरचना को विस्तार से बताया।
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कलेक्टर की पहल और प्रशासन की भूमिका
जिला प्रशासन, विशेषकर कलेक्टर चंदन त्रिपाठी, द्वारा क्षेत्र में सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार, प्रशासन स्थानीय इतिहास, परंपरा और जनसहभागिता को जोड़ते हुए ऐसे कार्यों को प्रोत्साहित कर रहा है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों की पहचान मजबूत हो सके।
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धर्म-कर्म और सामाजिक सेवा का जुड़ाव
इस पहल का एक महत्वपूर्ण पक्ष “धर्म-कर्म” से जुड़े कार्य हैं, जो समाज में सकारात्मक ऊर्जा और एकता का संदेश दे रहे हैं।
गौसेवा और धार्मिक आयोजन
ग्रामीणों के बीच सहयोग और सेवा कार्य
सामाजिक जागरूकता अभियान
बाल्मिक दुबे जैसे सामाजिक कार्यकर्ता इन गतिविधियों के माध्यम से न केवल परंपराओं को जीवित रख रहे हैं, बल्कि नई पीढ़ी को भी अपनी जड़ों से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।
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पर्यटन और सांस्कृतिक पहचान को बढ़ावा
यदि ऐसे प्रयासों को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाया जाए, तो कोरिया जिला एक सांस्कृतिक और ग्रामीण पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित हो सकता है।
गुलाबचंद जी जैसे बुजुर्गों की कहानियां, स्थानीय धार्मिक स्थल और परंपराएं—ये सभी मिलकर क्षेत्र की एक अलग पहचान बना सकते हैं।
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“गूगल युग” में जमीनी ज्ञान की अहमियत
आज जब जानकारी का बड़ा हिस्सा इंटरनेट पर निर्भर हो गया है, ऐसे में यह पहल एक संदेश देती है कि वास्तविक और प्रामाणिक ज्ञान अभी भी जमीनी स्तर पर मौजूद है।
यदि इसे समय रहते संरक्षित नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां अपने ही इतिहास से अनजान रह जाएंगी।
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संरक्षण की जरूरत और आगे की राह
इस पूरे प्रयास ने यह स्पष्ट कर दिया है कि:
बुजुर्गों के अनुभवों को रिकॉर्ड करना जरूरी है
प्रशासन और समाज को मिलकर काम करना होगा
धर्म-कर्म और सांस्कृतिक गतिविधियों को विकास से जोड़ना होगा
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कोरिया जिले से उठी यह पहल एक मॉडल बन सकती है, जहां इतिहास, प्रशासन और धर्म-कर्म तीनों मिलकर समाज के समग्र विकास की दिशा तय करें।
101 वर्षीय गुलाबचंद जी की जीवंत कहानियां और समाजसेवियों का समर्पण यह दिखाता है कि अगर प्रयास सच्चे हों, तो गांव से भी राष्ट्रीय स्तर की सोच जन्म ले सकती है।
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“जय गौ माता, जय भारत माता” — के साथ अपनी विरासत को सहेजने और आत्मनिर्भर भारत की ओर बढ़ने का आह्वान।

