By: Nilesh Soni | विशेष रिपोर्ट
श्याम सिंह मरकाम
(गोंडवाना गणतंत्र पार्टी राष्ट्रीय महासचिव)
देशभर में आदिवासी अधिकारों और पहचान की बहस के बीच, गोंडवाना समाज की आवाज अब स्थानीय दायरे से निकलकर राष्ट्रीय मंच तक पहुंचती दिखाई दे रही है।
“अब चुप्पी नहीं… गोंडवाना का जवाब आएगा!” जैसे सशक्त नारों के साथ यह आंदोलन तेजी से व्यापक जनसमर्थन जुटा रहा है।
गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव श्यामसिंह मरकाम ने इस उभरते जनआंदोलन को लेकर बड़ा बयान देते हुए कहा कि यह केवल एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं, बल्कि देशभर के आदिवासी समाज के अधिकार, अस्तित्व और सम्मान की लड़ाई है।
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“अब निर्णायक दौर में संघर्ष” — मरकाम
श्यामसिंह मरकाम ने स्पष्ट शब्दों में कहा:
“लंबे समय से गोंडवाना समाज की उपेक्षा की गई है। अब समाज जाग चुका है और अपने अधिकारों के लिए एकजुट होकर संघर्ष करेगा।

जो अपने हक के लिए खड़ा होता है, वही इतिहास बनाता है।”
उन्होंने यह भी संकेत दिए कि आने वाले समय में आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर संगठित और तेज किया जाएगा, जिससे सरकार और नीति-निर्माताओं तक समाज की मांगें मजबूती से पहुंच सकें।
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युवाओं में उबाल, गांव से शहर तक असर
इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरा है युवा वर्ग।
मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और झारखंड जैसे राज्यों के ग्रामीण और शहरी इलाकों में युवाओं की सक्रिय भागीदारी ने इस अभियान को नई ऊर्जा दी है।
सोशल मीडिया से लेकर जमीनी स्तर तक
सभाएं, जागरूकता अभियान और संगठन विस्तार
सांस्कृतिक पहचान को पुनर्जीवित करने की पहल
इन सभी माध्यमों से आंदोलन अब जनजागरण अभियान का रूप लेता जा रहा है।
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“सिर्फ आंदोलन नहीं, अस्तित्व का सवाल”
समाज के लोगों का मानना है कि यह केवल राजनीतिक आंदोलन नहीं, बल्कि अस्तित्व और सम्मान की रक्षा का संकल्प है।
महासचिव श्याम सिंह मरकाम ने कहा कि यदि यह एकजुटता इसी तरह बढ़ती रही, तो गोंडवाना आंदोलन आने वाले समय में देश की प्रमुख सामाजिक-राजनीतिक धाराओं में शामिल हो सकता है।
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राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ती अहमियत
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, आदिवासी वोट बैंक और उनकी सामाजिक-आर्थिक मांगें अब राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ रही हैं।
ऐसे में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का यह अभियान भविष्य में नीतिगत बदलाव और राजनीतिक समीकरणों को भी प्रभावित कर सकता है।
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गोंडवाना समाज की यह नई आवाज अब चेतावनी भी है और बदलाव का संकेत भी।
“अब चुप्पी नहीं…” का नारा केवल शब्द नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय स्तर पर उभरती सामाजिक चेतना का प्रतीक बनता जा रहा है।

