न्यूज़ रिपोर्ट निलेश सोनी📍 छत्तीसगढ़/ से विशेष रिपोर्ट
देश में स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने की दिशा में जहां एक ओर सौर ऊर्जा मॉडल को भविष्य का आधार माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर काम करने वाले तकनीशियनों की अनदेखी ने इस पूरे ढांचे की स्थिरता पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।
छत्तीसगढ़ में CREDA के अंतर्गत कार्यरत करीब 560 “सौर योद्धा” तकनीशियन आज बेरोजगारी के कगार पर खड़े हैं।
सूत्रों के अनुसार, वर्षों से ग्रामीण और दूरस्थ इलाकों में सौर संयंत्रों के संचालन, रखरखाव और मरम्मत की जिम्मेदारी निभा रहे इन तकनीशियनों को अचानक सेवा से बाहर करने का निर्णय लिया गया है।
इसका सीधा असर न सिर्फ उनके परिवारों पर पड़ा है, बल्कि राज्य में संचालित सौर परियोजनाओं के भविष्य पर भी संकट गहराता दिख रहा है।

गांवों में पहले से स्थापित सोलर प्लांट और जल आपूर्ति योजनाएं तकनीकी देखरेख के अभाव में धीरे-धीरे ठप पड़ने लगी हैं।
कई स्थानों पर लोग फिर से अंधेरे और जल संकट की स्थिति का सामना कर रहे हैं।
ऐसे में यह सवाल उठने लगा है कि क्या भारत की सौर ऊर्जा योजनाएं केवल उद्घाटन तक सीमित रह जाएंगी?
तकनीशियनों का कहना है कि 10-12 वर्षों की सेवा के बाद इस तरह हटाया जाना उनके साथ अन्याय है।
उनका आरोप है कि यह योजनाबद्ध तरीके से स्थानीय युवाओं की रोज़ी-रोटी छीनने जैसा कदम है। प्रभावित कर्मचारी अब आंदोलन की तैयारी में जुट गए हैं और चेतावनी दे रहे हैं कि यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा जनआंदोलन बन सकता है।

यदि जमीनी स्तर पर काम करने वाले तकनीकी कर्मचारियों की अनदेखी की गई, तो छत्तीसगढ़ की ग्रीन एनर्जी योजनाओं की सफलता अधूरी रह सकती है।
यह मामला अब केवल एक राज्य का नहीं, बल्कि देशभर में लागू सौर मॉडल की विश्वसनीयता से जुड़ता जा रहा है।
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