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“सरकारी ‘जवाहर बाग’ भूमि पर अवैध कब्जा —जंगल, जमीन और जनहित पर संकट”………..

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By: बेनी माधव कुशवाहा (District Reporter), शहडोल….

📍 विशेष रिपोर्ट | शहडोल (मध्यप्रदेश).

मध्यप्रदेश के शहडोल जिले के जयसिंहनगर विकासखंड अंतर्गत सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे का एक गंभीर और बहुआयामी मामला सामने आया है,

जिसने न केवल राजस्व और प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि पंचायत व्यवस्था, वन विभाग और स्थानीय राजनीतिक जवाबदेही में खड़ा कर दिया है।

📝 पूरा मामला क्या है?

प्राप्त जानकारी के अनुसार, ग्राम पंचायत सीधी के वार्ड क्रमांक 10 में स्थित खसरा नंबर 7/2 की भूमि, जो “जवाहर बाग” के नाम से शासकीय रिकॉर्ड में दर्ज है, पर ग्राम कुदरी निवासी द्वारा कथित रूप से अवैध कब्जा किया जा रहा है।

यह भूमि सार्वजनिक उपयोग और हरित क्षेत्र के रूप में सुरक्षित मानी जाती है, लेकिन वर्तमान में इस पर अतिक्रमण की गतिविधियां खुलेआम जारी हैं।


⚖️ राजस्व विभाग की दृष्टि से गंभीर लापरवाही

राजस्व संहिता के अनुसार किसी भी शासकीय भूमि पर अतिक्रमण दंडनीय अपराध है।

खसरा रिकॉर्ड में दर्ज भूमि पर कब्जा हटाना तहसील प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी होती है।

बावजूद इसके, न तो सीमांकन की कार्रवाई हुई और न ही अतिक्रमण हटाने का कोई नोटिस जारी किया गया।


🏛️ प्रशासनिक तंत्र पर सवाल

मामले की जानकारी संबंधित अधिकारियों तक पहुंचने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं होना,
प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी को दर्शाता है।

या फिर प्रभावशाली लोगों के संरक्षण में यह कब्जा जारी है?

यह सवाल अब आम जनता के बीच चर्चा का विषय बन चुके हैं।

🌳 वन विभाग की दृष्टि: हरित क्षेत्र पर खतरा

“जवाहर बाग” जैसी भूमि केवल राजस्व रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं होती, बल्कि पर्यावरण और जैव विविधता के संरक्षण से भी जुड़ी होती है।

इस तरह के अतिक्रमण से हरित क्षेत्र समाप्त हो रहे हैं

भविष्य में यह क्षेत्रीय पर्यावरण संतुलन को प्रभावित कर सकता है

यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला वन संरक्षण कानूनों के उल्लंघन तक भी पहुंच सकता है।

🏡 ग्राम पंचायत और जिला पंचायत की भूमिका ?

स्थानीय शासन व्यवस्था, विशेषकर ग्राम पंचायत और जिला पंचायत की जिम्मेदारी होती है कि वे सार्वजनिक संपत्तियों की रक्षा करें।

पंचायत स्तर पर इस मामले में कोई ठोस हस्तक्षेप नहीं हुआ

न ही किसी प्रकार का प्रस्ताव या आपत्ति दर्ज की गई

यह चुप्पी पंचायत प्रतिनिधियों की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाती है।

🗳️ राजनीतिक दृष्टिकोण: जवाबदेही से बचाव?

इस पूरे मामले में स्थानीय जनप्रतिनिधियों की चुप्पी भी कई सवाल खड़े करती है।

या फिर चुनावी समीकरणों के कारण इस मुद्दे को नजरअंदाज किया जा रहा है?

राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में ऐसे मामले अक्सर ठंडे बस्ते में चले जाते हैं।


😡 ग्रामीणों में आक्रोश

उनका कहना है कि:

यदि शीघ्र अतिक्रमण नहीं हटाया गया

तो वे कलेक्टर कार्यालय से लेकर उच्च स्तर तक शिकायत करेंगे

⚠️ तीखे सवाल

क्या प्रशासनिक तंत्र पर दबाव या मिलीभगत का असर है?

सरकारी जमीन की सुरक्षा आखिर कौन करेगा?

📢 जनता की मांग

✔️ अवैध कब्जे को तत्काल हटाया जाए
✔️ दोषी व्यक्तियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई हो
✔️ संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जाए
✔️ सार्वजनिक भूमि की सुरक्षा के लिए स्थायी व्यवस्था बनाई जाए

🧾 निष्कर्ष

जयसिंहनगर का यह मामला केवल एक गांव या एक खसरा नंबर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे सिस्टम की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़ा करता है।

यदि समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो यह न केवल सरकारी संपत्तियों के अतिक्रमण को बढ़ावा देगा, बल्कि जनता का प्रशासन से विश्वास भी कमजोर करेगा।

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