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“छात्रावासों में लगातार गंभीर घटनाएं: क्या आदिवासी विकास विभाग की निगरानी व्यवस्था हुई फेल?”…………..

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📍 कोरिया से विशेष रिपोर्ट…Nilesh Sony ..

कोरिया जिले में सुरक्षा, संवेदनशीलता और जवाबदेही पर उठे बड़े सवाल—प्रशासनिक चुप्पी पर भी तीखी नजर

कोरिया जिले में आदिवासी विकास विभाग के अंतर्गत संचालित छात्रावासों में बीते समय में सामने आई चार बड़ी और संवेदनशील घटनाओं ने न केवल विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही को भी कटघरे में ला खड़ा किया है। लगातार हो रही घटनाएं यह संकेत दे रही हैं कि निगरानी, सुरक्षा और प्रबंधन के स्तर पर कहीं न कहीं गंभीर चूक हो रही है।

सबसे ताजा मामला कटगोड़ी स्थित पोस्ट मैट्रिक छात्रावास का है, जहां 11वीं कक्षा के एक छात्र ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, छात्र ने घटना से पहले अपने पिता से घर जाने की इच्छा जताई थी, लेकिन उसके बाद उसने यह आत्मघाती कदम उठा लिया। यह घटना केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि छात्रावासों में मानसिक स्वास्थ्य, परामर्श और निगरानी व्यवस्था की विफलता का गंभीर संकेत है।

इससे पहले भी जिले के एक कन्या छात्रावास में नाबालिग छात्रा के गर्भवती होने और वहीं बच्चे को जन्म देने की घटना ने पूरे तंत्र को झकझोर दिया था। यह मामला छात्रावासों में सुरक्षा, अनुशासन और जिम्मेदार अधिकारियों की सतर्कता पर बड़ा प्रश्नचिह्न है। सवाल यह है कि इतनी संवेदनशील स्थिति में प्रशासन और प्रबंधन को भनक तक क्यों नहीं लगी?

इसी कड़ी में छात्रों द्वारा कथित “सिक्योरिटी मनी” के नाम पर अवैध वसूली के खिलाफ सड़क पर उतरकर चक्का जाम करना यह दर्शाता है कि छात्रावासों में आर्थिक शोषण के आरोप भी सामने आ रहे हैं। यदि यह आरोप सत्य हैं, तो यह सीधे-सीधे विभागीय भ्रष्टाचार और अनियमितता की ओर इशारा करता है।

वहीं एक अन्य मामले में छात्रावास के प्यून पर छेड़छाड़ का आरोप लगा, जो बाद में न्यायालय द्वारा निराधार पाया गया और कर्मचारी को बहाल कर दिया गया। हालांकि न्यायिक निर्णय ने एक व्यक्ति को राहत दी, लेकिन इस तरह के आरोपों का उत्पन्न होना भी छात्रावासों के माहौल और विश्वास की स्थिति पर सवाल खड़े करता है।

प्रशासनिक दृष्टि से सवाल

लगातार सामने आ रही इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सहायक आयुक्त (AC) स्तर पर निगरानी और निरीक्षण प्रणाली या तो कमजोर है या फिर केवल कागजी औपचारिकता बनकर रह गई है। प्रश्न यह भी उठता है कि क्या नियमित निरीक्षण, छात्र संवाद और सुरक्षा ऑडिट वास्तव में किए जा रहे हैं या नहीं?

विभागीय जिम्मेदारी से बचाव या जवाबदेही?

आदिवासी छात्र-छात्राएं, जो दूरदराज के क्षेत्रों से शिक्षा के लिए इन छात्रावासों में आते हैं, उनकी सुरक्षा और समुचित देखरेख सुनिश्चित करना विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारी है। लेकिन मौजूदा हालात यह दर्शाते हैं कि जिम्मेदारी तय करने की बजाय मामले सामने आने के बाद केवल औपचारिक कार्रवाई तक सीमित रह जाया जाता है।

जनता और अभिभावकों में आक्रोश

लगातार हो रही घटनाओं ने अभिभावकों और सामाजिक संगठनों में गहरा असंतोष पैदा कर दिया है। उनका स्पष्ट कहना है कि यदि समय रहते ठोस और कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो यह स्थिति और भयावह हो सकती है।

अब आगे क्या?

कोरिया जिले के इन मामलों ने राज्य ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर आदिवासी छात्रावासों की व्यवस्था पर बहस छेड़ दी है। अब नजर इस बात पर टिकी है कि प्रशासन और आदिवासी विकास विभाग इन घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए केवल जांच तक सीमित रहते हैं या फिर जवाबदेही तय कर ठोस सुधारात्मक कदम उठाते हैं।

(प्रशासनिक दृष्टि से यह मामला केवल घटनाओं की श्रृंखला नहीं, बल्कि सिस्टम की संवेदनशीलता और जवाबदेही की परीक्षा है।)

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