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छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले से भ्रष्टाचार का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने शासन की पारदर्शी व्यवस्था के दावों की पोल खोलकर रख दी है।…………

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Report Nilesh sony……….

सोनहत/कोरिया/….

जनपद पंचायत सोनहत के ग्राम पंचायत कैलाशपुर में एक गरीब ग्रामीण के हक के पैसे को डकारने के लिए डिजिटल हेराफेरी और डराने-धमकाने का “सिंडिकेट” चल रहा है।

क्या है पूरा मामला?
ग्राम कैलाशपुर निवासी समय लाल (पिता स्व. पवन साय) को साल 2025 में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर स्वीकृत हुआ था। गरीब किसान को उम्मीद थी कि अब उसके सिर पर पक्की छत होगी, लेकिन भ्रष्टाचार के दीमकों ने उसकी उम्मीदों को कागजों पर ही चट कर दिया।

बिना घर की नींव रखे ही, रोजगार सहायक ने फर्जी ‘जियो टैग’ (Geo-tag) और फर्जी फोटो का सहारा लेकर समय लाल के नाम की दो किस्तें निकाल लीं:

पहली किस्त: ₹40,000 (दिनांक 17/03/2025)
दूसरी किस्त: ₹55,000 (दिनांक 22/12/2025)
कुल ₹95,000 की राशि किसी अन्य खाते में ट्रांसफर कर ली गई, जबकि समय लाल के खाते में फूटी कौड़ी भी नहीं आई।

भ्रष्टाचार का ‘डिजिटल खेल’ और दबंगई

पड़ताल में सामने आया कि रोजगार सहायक ने किसी दूसरे घर की फोटो और लोकेशन का उपयोग कर कागजों में घर को ‘प्लिंथ लेवल’ तक बनता दिखा दिया।

जब समय लाल ने अपने घर के काम के बारे में पूछा, तो उसे डराया-धमकाया गया।

आरोप है कि रोजगार सहायक के पति, जो पेशे से शिक्षक हैं, ग्रामीणों पर दबाव बनाते हैं और ₹5,000 की रिश्वत मांगते हैं।

पीड़ित समय लाल का दर्द: “साहब, मेरे घर की तो एक ईंट भी नहीं रखी गई, लेकिन कागजों में ₹95,000 निकल गए।

जब पूछने गया तो कहा गया कि 5 हजार लाओ तब घर बनने देंगे, वरना जो करना है कर लो, कलेक्टर भी कुछ नहीं कर पाएगा।”

ग्राउंड रिपोर्ट: यह सिर्फ एक मामला नहीं है!

जब इस मामले की गहराई से जांच की गई, तो पता चला कि कैलाशपुर में भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत गहरी हैं।

ऐसे कई घर पाए गए जो धरातल पर अस्तित्व में ही नहीं हैं या अधूरे पड़े हैं, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में उनका पूरा पैसा आहरित किया जा चुका है।

यह एक सुनियोजित तरीके से ग्रामीणों को लूटने का बड़ा घोटाला प्रतीत होता है।

कलेक्टर से न्याय की गुहार

थक-हारकर पीड़ित किसान समय लाल अब जिला कलेक्टर कार्यालय के चक्कर काट रहा है।

उसने लिखित आवेदन देकर मांग की है कि:

दोषी रोजगार सहायक और उसके पति पर दंडात्मक कार्यवाही की जाए।
उसके नाम की स्वीकृत राशि उसे वापस दिलाई जाए ताकि वह अपना घर बना सके।

पूरे पंचायत में हुए प्रधानमंत्री आवास कार्यों की निष्पक्ष जांच हो।
प्रशासन का पक्ष
फिलहाल, जिला प्रशासन ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच के आदेश दिए हैं।

अब देखना यह होगा कि क्या इस गरीब किसान को उसका हक मिलता है या भ्रष्टाचार की यह फाइल भी दफ्तरों की धूल फांकती रह जाएगी।

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