छत्तीसगढ़ के कई शहरों और कस्बों में अवैध कब्जे, सरकारी योजनाओं का दुरुपयोग और प्रशासनिक भ्रष्टाचार को लेकर आम नागरिकों में गहरी नाराजगी देखी जा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि शासन-प्रशासन की अनदेखी के कारण भू-माफिया, फर्जी कार्डधारक और गलत तरीके से लाभ लेने वाले तत्व सक्रिय हो गए हैं। कई नगरपालिकाओं में यह आरोप सामने आए हैं कि कर्मचारियों पर दबाव बनाकर या रिश्वत लेकर राशन कार्ड व नगर पालिका कार्ड बनाए जा रहे हैं। नागरिकों ने बताया कि ₹ 500 तक लेकर कार्ड बनवाने की घटनाएँ आम हो चुकी हैं। कुछ कर्मचारियों का कहना है कि वे “ऊपर से दबाव” में काम करने को मजबूर हैं।
इसी तरह, नगर पालिका की दुकानों की नीलामी में भी अनियमितताओं के आरोप लगे हैं। जिन दुकानों की शुरुआती बोली 10–15 लाख रुपये की थी, वे कथित रूप से 50–60 लाख रुपये में बिक रहीं हैं। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, कुछ बाबू और कर्मचारियों की मिलीभगत से यह लेन-देन हो रहा है, जिससे सरकारी संपत्ति की सीधी हानि हो रही है इसके अलावा, भू-माफिया और अवैध निर्माण का कारोबार भी तेजी से बढ़ा है। जिन लोगों के पास पहले खुद का घर नहीं था, वे अब चार-चार मकानों के मालिक बन चुके हैं। सूत्र बताते हैं कि अवैध रूप से सरकारी जमीनों की बिक्री, फर्जी पट्टा और दबाव में झूठे हलफनामे तैयार कराए जा रहे हैं।
स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि अवैध गतिविधियों में शामिल कुछ लोग अपनी वास्तविक आमदनी छिपाकर वैध कारोबार का रूप दे रहे हैं। कई ऐसे मामलों में परिजनों के जेल जाने के बाद भी कारोबारी गतिविधियाँ जारी हैं, जो कानून-व्यवस्था पर प्रश्न खड़े करती हैं। जनता का आरोप है कि प्रशासन और जनप्रतिनिधि इस स्थिति पर गंभीर नहीं हैं। कई नागरिकों का कहना है कि अगर समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं की गई तो प्रदेश में अपराध और अवैध कारोबार का नेटवर्क और मजबूत हो जाएगा।
सोचने वाली बात यह है कि सीएमओ (मुख्य नगरपालिका अधिकारी) को भी इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि जिले के अंदर ऐसे व्यक्तियों पर नज़र रखी जाए, जो समाज के लिए हानिकारक साबित हो रहे हैं। एक व्यक्ति जहाँ समाज को उज्जवल बना सकता है, वहीं एक व्यक्ति अपने कृत्यों से पूरे समाज को बदनाम भी कर देता है। यह भी चिंतन का विषय है कि कुछ लोग जो पिछले 10 सालों से उचित मूल्य की दुकान चला रहे हैं, आज करोड़ों के मालिक बन चुके हैं। सवाल यह उठता है कि यह संभव कैसे हुआ? समाज में अब नैतिक गिरावट की स्थिति बन चुकी है। कई प्रभावशाली परिवारों के लोग भी अपने स्वार्थ के कारण गलत प्रवृत्तियों के सामने चुप्पी साध लेते हैं। कुछ नेताओं के घरों तक में यह स्थिति देखने को मिल रही है, जहाँ अपने निजी लाभ के कारण लोग गलतियों को अनदेखा कर रहे हैं।
मीडिया के क्षेत्र में भी कुछ ऐसे लोग सक्रिय हैं, जो पत्रकारिता की आड़ में दलाली या निजी लाभ लेने का कार्य कर रहे हैं। कई बार बिना योग्य शिक्षा के लोग फर्जी पहचान या फर्जी आईडी बनवाकर डॉक्टर या पत्रकार जैसे पदनाम का उपयोग कर रहे हैं, जो समाज और पेशे दोनों के लिए शर्मनाक है। यह बेहद चिंताजनक है कि ठगी और धोखाधड़ी करने वाले कुछ व्यक्ति करोड़ों की संपत्ति के मालिक बन गए हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ जांच आवश्यक है। यह भी जांच का विषय है कि कौन-कौन से व्यक्ति विभिन्न चैनलों और मीडिया संस्थानों के माध्यम से गलत तरीके से आर्थिक लाभ उठा रहे हैं और सम्मान प्राप्त कर रहे हैं।
यदि इन सभी बिंदुओं की निष्पक्ष जांच नहीं की जाती, तो यह मान लेना पड़ेगा कि हमारा देश अब ऐसी स्थितियों को सामान्य मानने लगा है — जो कि एक गंभीर और सोचने योग्य स्थिति है।



