भोपाल — राज्य के कृषि फीडरों पर बिजली आपूर्ति को लेकर निरपेक्ष और सख्त आदेश जारी हुआ है। मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी (MP विद्युत) ने कहा है कि अगर किसी दिन किसी फीडर के माध्यम से 10 घंटे से अधिक बिजली किसानों को दी जाती है, तो उस फीडर से जुड़े अधिकारी-कर्मचारियों का वेतन कटेगा।
आदेशानुसार यदि किसी दिन कृषि फीडर को 10 घंटे से अधिक बिजली दी जाती है, तो पहले दिन ऑपरेटर का एक दिन का वेतन कटेगा। दो दिन तक उल्लंघन होने पर जूनियर इंजीनियर का एक दिन वेतन कटेगा; पांच दिन तक जारी रहने पर DGM का वेतन कटेगा; सात दिन तक लगातार उल्लंघन पर GM का एक दिन का वेतन कटेगा। कंपनी के सीएमडी ए. के. जैन के नाम से पत्र जारी किया गया है। यह सब इसलिए क्योंकि सरकार ने निर्धारित किया है कि कृषि फीडरों को प्रतिदिन 10 घंटे से अधिक बिजली नहीं दी जाए।
इस आदेश के बाद तुरंत सियासत गर्म हो गई है। विरोधी दलों ने इसे किसानों और कर्मचारियों दोनों के साथ अन्याय करार दिया है। विधायक उमंग सिंघार ने कहा है कि “क्या बिजली की कमी इतनी बढ़ गई है कि सिर्फ 10 घंटे दे सकते हैं?” उन्होंने इसे किसानों के साथ बेइमानी बताया।
इस आदेश का मूल उद्देश्य हो सकता है कि अपराधिक बिजली आपूर्ति या अनियंत्रित कृषि लोड को रोका जाए, जिससे वितरण-सिस्टम पर दबाव न बढ़े। लेकिन इस तरह की नीति से जोखिम यह है कि अगर किसान वास्तव में ज़रूरत से ज्यादा घंटे बिजली ले जाते हैं—शायद मौसम, फसल-प्रकार या समय-तालिका के कारण—तो फीडर-प्रबंधक/कर्मचारी को वेतन कटौती के डर से समय पर बिजली सप्लाई नहीं करें। कृषक-हित की दृष्टि से यह प्रश्न भी उठ सकता है कि क्या “10 घंटे” की सीमा समुचित है या किसानों-की भिन्न-भिन्न परिस्थितियों को ध्यान में लेकर लचीली व्यवस्था होना चाहिए।
यह आदेश निश्चित रूप से सख्त है—किसानों को दिया जाने वाला लाभ (बिजली) और अधिकारियों की जिम्मेदारी-बज़वाव को सीधे जोड़ रहा है। लेकिन इसका असर समझने योग्य है: अगर सरकार और विद्युत कंपनी इसे सही-तरह लागू करें, साथ में किसानों के हालात को ध्यान में रखें, तभी यह असरदार होगा। अन्यथा विवाद, असंतोष और वितरण-प्रतिक्रिया बढ़ सकती है।



