छत्तीसगढ़ में सत्ता के साथ-साथ चमचों का बोलबाला भी तगड़ा रहता है। ऐसा ही हाल पत्रकारिता में भी ऐसे भस्मासुर पैदा हो गए हैं जो चैनल, मीडिया और पत्रकारिता के नाम पर धज्जियां उड़ा रहे हैं। जबकि प्रेस कार्ड के नियम अनुसार, किसी भी संवादाता का पे्रस कार्ड दो-तीन साल का बनता है, लेकिन कुछ संवादाता अपनी बपौती समझकर और गुट बनाकर अधिकारियों पर हावी हो रहे हैं। जिससे पत्रकारिता की गिरावट का एक बड़ा कारण यह है कि कुछ पत्रकार अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर रहे हैं और अधिकारियों पर दबाव डालकर अपने हित साधने की कोशिश कर रहे हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, इसी प्रकार मनेंद्रगढ़ एमसीबी में एक घटना सामने आई है, जहां मनेंद्रगढ़ डीएफओ अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के साथ बैठक कर रहे थे। इस बैठक में सभी पार्टी के नेताओं ने एक भालू के आतंक की सूचना देने का उल्लेख किया। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि भालू ने शहर के अंदर घुसकर हमला किया या किसी को काटा है, क्योंकि इस संबंध में कोई ठोस जानकारी नहीं मिली है। वहीं कुछ लोगों का आरोप है कि इस मामले में स्वार्थी लोग शामिल हैं जो वन विभाग, नेताओं और पत्रकारों को आर्थिक लाभ पहुंचाकर अपने हित साधने की कोशिश कर रहे हैं। उनका यह भी आरोप है कि कुछ लोगों ने वन विभाग को अपने निजी हितों के लिए उपयोग करने का प्रयास किया है।
जानकार सूत्रों का दावा है कि, कुछ लोगों को वन विभाग से हर महीने पूर्व से पैसे मिलते आ रहे थे और उसी मुद्दे को लेकर वर्तमान डीएफओ को निशाना बनाया जा रहा है। यह सोचने वाली बात है कि शासकीय कार्य में बाधा डालने वालों पर शासन को कार्रवाई करनी चाहिए। वहीं विधायक- स्वास्थ्य मंत्री को वशिष्ठ टाइम्स समाचार पत्र के संपादक ने फोन करने की कोशिश की, लेकिन मंत्री ने फोन नहीं उठाया। यह बात एक जिम्मेदार मंत्री पद के लिए लापरवाही मानी जा सकती है या पद का घमण्ड ? यहां तक कि, सत्ताधारी पार्टी और विपक्षी पार्टी दोनों एक मंच पर एक सुर में बोल रहे हैं, जिससे यह पता चलता है कि शासन का कामकाज ठीक से नहीं चल रहा है। कुछ नेताओं और पत्रकारों ने डीएफओ पर आरोप लगाया है कि वे फोन नहीं उठाते हैं और डीएफओ को ही प्यून समझते हैं। ऐसे में जब स्वार्थ सिद्ध नहीं होता है तो कुछ लोग आंदोलन की रूपरेखा बना लेते हैं। यह एक गंभीर मुद्दा है जिस पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
मिली जानकारी के अनुसार, सोशल मीडिया पर एक पत्रकार की कहानी सामने आई है जो पहले कुछ नहीं था लेकिन अब करोड़ों का मालिक बन चुका है और माइक पर मीडिया को बयान दे रहा है कि, मनेंद्रगढ़ के निवासियों को लगता है कि ऐसे अधिकारी चाहिए जो महीने में पैसा पहुंचा दें, लेकिन यह कहानी पत्रकारों और नेताओं के गठजोड़ की पोल खोलती है जो डीएफओ के साथ अभद्र व्यवहार करने से नहीं हिचकिचाते। कुछ लोगों का आरोप है कि नेताओं और पत्रकारों का एकमात्र उद्देश्य आर्थिक सहयोग प्राप्त करना है, न कि जंगल, निर्माण, सड़क या शिक्षा की भलाई। यह अराजकता का आतंक है, जो पूरे देश में फैल रहा है।
वहीं वन विभाग की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन भ्रष्टाचार और लापरवाही के आरोप लग रहे हैं। ऐसे में छत्तीसगढ़ शासन और प्रशासन को अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए और शासकीय कार्यों में बाधा डालने वालों पर कार्रवाई करनी चाहिए कि, यह भालू का आतंक नहीं, बल्कि अराजकता का आतंक है, जिसे रोकने की आवश्यकता है । इस संबंध में और भी समाचार आगे विस्तार से प्रकाशित की जायेगी। यह समाचार मनेन्द्रगढ़ के आम जनता के विचारधाराओं द्वारा प्रकाशित किया जा रहा है।



