छत्तीसगढ़ के जन प्रतिनिधि जो कि जनता के चुने हुए जनप्रतिनिधि होते है न की अपने परिवार और न ही अपने जाति के आधार पर चुने जनप्रतिनिधि होते है। वह तो हर समाज के मत अनुसार जनप्रतिनिधि बनते है। लोगों में चर्चाऐं है कि, पैसे सत्ताधारियों को अपने पार्टी का विधायक बनाने के लिए साठ से ऊपर के व्यक्तियों को टीकट नहीं देना चाहिए, क्योंकि जब सत्तर से ऊपर उम्र हो जाती है तो शरीर के पूरे अंग काम करना शिथिल हो जाता है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, ऐसे ही एक मामला सामने आया है जो जिला पंचायत का है। जन प्रतिनिधि ने पहले तो अपना परिवारवाद खोला और जब परिवारवाद खत्म हो गये। तो उसमें जीत की सफलता मिली। उसके बाद जिला पंचायत का चुनाव हुआ। चुनाव में एक व्यक्ति को ज्यादा वोट मिले तो एक व्यक्ति को कम वोट मिले और एक व्यक्ति अनुपस्थित रहा। ज्यादा वोट वाला व्यक्ति विजय हासिल किया, उसको जिला अध्यक्ष बनाया गया। जानकार सूत्र बताते है कि, वह भी आदिवासी समाज का है। उस व्यक्ति ने जिला अध्यक्ष का पदभार ग्रहण कर पदभार सम्भालने का शपथ लिया। उसके उपरांत जन प्रतिनिधि द्वारा अपने ही पार्टी के जिलाध्यक्ष व जिला पंचायत अध्यक्ष के खिलाफ ही बयान देने लगे। इस सत्यता को समाचार में प्रकाशित नहीं किया गया, क्योंकि जानकार सूत्र बताते है कि, कुछ चट्टोकार पत्रकारों ने जनप्रतिनिधि की चापलूसी में समाचार प्रकाशित नहीं किया। अब ऐसे समाचार जो पैसे के बल पर चट्टोकारिता के माध्यम से व्यापार चल रहा है। वह तो इस बयान को छिपायेंगे ही।
मिली जानकारी के अनुसार, पूर्व में एक जिला ऐसा भी था जहां कलेक्टर ने ही करोड़ो रूपये कुछ लोगों के द्वारा वसूली कराया गया। उसमें भी प्रशासन द्वारा कुछ चट्टोकार पत्रकारों को दिवाली उपहार दिया गया। अब सोचने वाली बात है कि, जब जिले का मुख्या ही चट्टोकार पत्रकारों को अपने बापबायी कराने के लिए पैसा देता है तो पत्रकारिता कहां रह गयी ? इसी प्रकार जनप्रतिनिधि का एक चैनल में अपना बयान देते हुए देखा जा सकता है कि, जनप्रतिनिधि अपने पार्टी के प्रति वफादारी कर रहा है या बेवफाई ? अब इस वीडियो के आधार पर भाजपा हाई कमान क्या निर्णय लेगा ? कोई कहां नहीं जा सकता। अब इस एक चैनल के वीडियों को देख कर अंदाजा लगया जा सकता है। यह समाचार वीडियों को देखने के बाद प्रकाशित किया जा रहा है।