छत्तीसगढ़ में हाईकोर्ट के आदेशों की अनदेखी और प्रशासनिक अधिकारियों की मनमानी लगातार गंभीर मुद्दा बनती जा रही है। स्थिति यह है कि अदालत से राहत मिलने के बाद भी पीड़ितों को न्याय का वास्तविक लाभ नहीं मिल पा रहा है। आदेशों का पालन कराने के लिए लोगों को दोबारा कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है,
,और अवमानना याचिकाएं दायर करनी पड़ रही हैं। पिछले 12 वर्षों के आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि राज्य में अदालती आदेशों की अवहेलना लगातार बढ़ती जा रही है।
हाईकोर्ट में लंबित अवमानना मामलों के आंकड़े स्थिति की गंभीरता को साफ दर्शाते हैं। दिसंबर 2015 में जहां ऐसे मामलों की संख्या केवल 391 थी,
वहीं दिसंबर 2022 तक यह बढ़कर 2324 पहुंच गई। यानी महज आठ वर्षों में मामलों में लगभग छह गुना वृद्धि दर्ज की गई।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति न्यायिक प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर असर डाल रही है। यदि कोर्ट के आदेशों का पालन समय पर न हो, तो आम नागरिक का न्यायपालिका पर भरोसा कमजोर हो सकता है।
अवमानना मामलों में सख्त कार्रवाई और स्पष्ट गाइडलाइन की मांग को लेकर वर्ष 2020 में हाईकोर्ट में एक याचिका भी दायर की गई थी। अधिवक्ता संतोष पांडेय ने याचिका में आरोप लगाया था कि प्रदेश के अधिकारी हाईकोर्ट के आदेशों की खुलेआम अनदेखी कर रहे हैं।
हाल के वर्षों में कई मामलों में हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। 7 मई 2025 की सुनवाई में कोर्ट ने शिक्षकों की नियुक्ति मामले में पूछा कि रोक के बावजूद जॉइनिंग क्यों कराई गई। इसी तरह जल संसाधन विभाग में नियम विरुद्ध पदस्थापना के मामले में चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की बेंच ने एफआईआर दर्ज कराने तक की चेतावनी दी थी।

