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कोरिया/सोनहत – “आज़ादी के 78 साल बाद भी ‘ढोड़ी’ का पानी पीने को मजबूर वनांचल के लोग — स्वच्छ भारत मिशन पर बड़ा सवाल” जनपद पंचायत सोनहत के ग्राम पंचायत रावतसरई की बदहाल तस्वीर, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर उठे गंभीर सवाल………….

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कोरिया/सोनहत | विशेष संवाददाता

विशेष रिपोर्ट nilesh sony

एक ओर केंद्र और राज्य सरकारें “स्वच्छ भारत मिशन”, “हर घर जल” और ग्रामीण विकास योजनाओं के बड़े-बड़े दावे कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर कोरिया जिले के जनपद पंचायत सोनहत अंतर्गत वनांचल एवं दूरस्थ ग्राम पंचायत रावतसरई में आज भी ग्रामीण दूषित “ढोड़ी” का पानी पीने को मजबूर हैं। आज़ादी के 78 वर्षों बाद भी मूलभूत पेयजल जैसी आवश्यक सुविधा से वंचित ग्रामीणों की स्थिति शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर रही है।

गर्मी के इस भीषण मौसम में रावतसरई के ग्रामीण जान जोखिम में डालकर गंदे जलस्रोतों से पानी लाने को विवश हैं। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि कई बार पंचायत और संबंधित विभागों को समस्या से अवगत कराया गया, लेकिन अब तक स्थायी समाधान नहीं निकाला गया। गांव में स्वच्छ पेयजल व्यवस्था पूरी तरह चरमराई हुई है, जबकि कागजों में विकास योजनाओं के करोड़ों रुपये खर्च होने के दावे किए जा रहे हैं।

ग्रामीणों ने बताया कि क्षेत्र में नल-जल योजना और पेयजल योजनाओं का लाभ धरातल पर दिखाई नहीं देता। महिलाएं और बच्चे प्रतिदिन लंबी दूरी तय कर ढोड़ी से पानी भरने को मजबूर हैं। दूषित पानी के कारण बीमारी फैलने का खतरा लगातार बना हुआ है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी स्थिति सुधारने के बजाय मौन साधे बैठे हैं।

यह मामला केवल एक गांव की समस्या नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास योजनाओं की जमीनी हकीकत को उजागर करता है। सवाल यह भी उठ रहा है कि जब शासन “हर घर जल” और “स्वच्छ भारत” के नाम पर व्यापक प्रचार-प्रसार कर रहा है, तब वनांचल क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी और ग्रामीण परिवार आखिर क्यों बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं?

स्थानीय लोगों ने जिला प्रशासन कोरिया, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग तथा क्षेत्रीय विधायक का ध्यान इस गंभीर समस्या की ओर आकर्षित करते हुए तत्काल स्वच्छ पेयजल व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र समाधान नहीं हुआ तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होंगे।

अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधि इस गंभीर मानवीय समस्या को कितनी गंभीरता से लेते हैं, या फिर वनांचल के ग्रामीण यूं ही “विकास” के दावों के बीच गंदा पानी पीने को मजबूर रहेंगे।

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