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राष्ट्रीय योजना पर स्थानीय लूट का साया: सोनहत के ‘एकलव्य स्कूल’ में ठेकेदार की मनमानी, क्या केंद्र की परियोजना बन गई भ्रष्टाचार का किला?………….

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📝 *खबर (निलेश सोनी):

सोनहत (छत्तीसगढ़)। देश के आदिवासी बच्चों को आधुनिक शिक्षा और सुरक्षित आवास देने के उद्देश्य से केंद्र सरकार द्वारा संचालित Eklavya Model Residential Schools योजना अब Sonhat में गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है।

जिस विद्यालय को आदिवासी अंचल के बच्चों के भविष्य की नींव बनना था,

वही निर्माण कार्य अब भ्रष्टाचार, पर्यावरण विनाश और श्रम शोषण की राष्ट्रीय स्तर की कहानी बनता जा रहा है।

सूत्रों का कहना है कि यह परियोजना सीधे Ministry of Tribal Affairs के अधीन बताकर स्थानीय स्तर पर नियमों को पूरी तरह दरकिनार किया जा रहा है।

निर्माण एजेंसी और ठेकेदार खुलेआम यह कहते नजर आ रहे हैं कि “यह केंद्र सरकार का काम है, राज्य के अधिकारी इसमें कुछ नहीं कर सकते।”

यह बयान सिर्फ अहंकार नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था को खुली चुनौती माना जा रहा है।

राष्ट्रीय योजना, लेकिन स्थानीय कानूनों का कत्लेआम

विशेषज्ञों का मानना है कि चाहे योजना केंद्र सरकार की हो, लेकिन जमीन, खनिज, पर्यावरण और श्रम कानून पूरी तरह राज्य के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर किसके संरक्षण में यह निर्माण कार्य नियमों को रौंदते हुए चल रहा है?

स्थानीय लोगों का आरोप है कि:

घटिया रेत और कम सीमेंट से निर्माण किया जा रहा है

गुणवत्ता जांच की कोई व्यवस्था नहीं

इंजीनियरों द्वारा सवाल उठाने वालों को धमकाया जा रहा है

करोड़ों रुपये की लागत से बनने वाले इस विद्यालय की नींव ही अगर कमजोर रखी जा रही है,

तो आने वाले वर्षों में बच्चों की सुरक्षा पर गंभीर खतरा खड़ा हो सकता है।

प्रकृति पर हमला: साल के पेड़ काटे, लकड़ियाँ गायब

निर्माण स्थल के आसपास वर्षों पुराने साल के पेड़ों को मशीनों से काटे जाने का आरोप भी सामने आया है।

ग्रामीणों का कहना है कि पेड़ों की कटाई के बाद उनकी लकड़ियाँ भी मौके से रहस्यमय तरीके से गायब हो गईं।

यह सवाल अब सीधे वन विभाग और प्रशासन पर उठ रहा है:

क्या पेड़ काटने की अनुमति ली गई थी?

अगर अनुमति थी, तो दस्तावेज सार्वजनिक क्यों नहीं किए गए?

सरकारी लकड़ी आखिर गई कहाँ?

पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि राष्ट्रीय स्तर की योजना के नाम पर जंगलों को साफ करना विकास नहीं, बल्कि संसाधनों की लूट है।

मजदूरों का शोषण: महिलाओं को आधी मजदूरी

निर्माण स्थल पर काम कर रहे मजदूरों के साथ भी गंभीर भेदभाव की शिकायत सामने आई है।

स्थानीय सूत्रों के अनुसार, पुरुष और महिला मजदूर एक ही काम करने के बावजूद महिलाओं को कम मजदूरी दी जा रही है।

यदि यह सच है, तो यह सीधे श्रम कानूनों का उल्लंघन है और राष्ट्रीय स्तर की परियोजना में इस तरह का भेदभाव सरकार की छवि पर भी सवाल खड़ा करता है।

रेत माफिया का खुला खेल: रॉयल्टी का एक पैसा नहीं

ग्रामीणों का दावा है कि निर्माण में उपयोग की जा रही रेत स्थानीय नदी-नालों से अवैध रूप से निकाली जा रही है।

न तो रॉयल्टी की पर्ची दिखाई जा रही है और न ही भंडारण की अनुमति।

यदि यह आरोप सही हैं, तो यह केवल भ्रष्टाचार नहीं बल्कि शासन के राजस्व पर सीधा हमला है।

राजनीतिक सवाल भी खड़े

यह मामला अब सिर्फ एक निर्माण कार्य तक सीमित नहीं रहा। सवाल सीधे प्रशासन और राजनीति तक पहुँच गया है:

क्या केंद्र की योजना का नाम लेकर स्थानीय अधिकारियों को जानबूझकर दूर रखा जा रहा है?

क्या ठेकेदार को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है?

क्या करोड़ों की परियोजना में गुणवत्ता की जगह कमीशन का खेल चल रहा है?

सबसे बड़ा सवाल: बच्चों का भविष्य या ठेकेदार का मुनाफा?

जिस विद्यालय को आदिवासी बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की नींव बनना था, वही आज भ्रष्टाचार, लापरवाही और मनमानी का प्रतीक बनता जा रहा है।

अब निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं—क्या जांच होगी? क्या निर्माण कार्य की गुणवत्ता की तकनीकी जांच कराई जाएगी?

और सबसे महत्वपूर्ण, क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी या फिर यह भी एक राष्ट्रीय योजना की आड़ में दबा दिया जाएगा?

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