Report Nilesh Sony
नई दिल्ली/छत्तीसगढ़/मध्यप्रदेश।
देश के विभिन्न आदिवासी अंचलों में जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर जनआंदोलन की चर्चा तेज हो गई है। आदिवासी संगठनों और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, वनाधिकारों की रक्षा तथा विस्थापन के मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाया जा रहा है।
इसी क्रम में गोंडवाना विचारधारा से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं द्वारा “जल-जंगल-जमीन बचाओ” अभियान को व्यापक जनसमर्थन देने की अपील की जा रही है।
पोस्टर और जनसंदेशों के माध्यम से यह सवाल उठाया जा रहा है कि यदि जंगलों की कटाई, खनन परियोजनाओं और अनियंत्रित विकास कार्यों के कारण आदिवासी समाज अपने पारंपरिक संसाधनों से वंचित होता रहा, तो इसका असर केवल स्थानीय समुदायों पर नहीं बल्कि पूरे देश के पर्यावरणीय संतुलन पर पड़ेगा।
अभियान में यह संदेश दिया जा रहा है कि जल, जंगल और जमीन केवल संसाधन नहीं बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन, संस्कृति और अस्तित्व का आधार हैं।
गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव श्याम सिंह मरकाम सहित कई नेताओं ने विभिन्न मंचों से आदिवासी अधिकार, वन संरक्षण और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को मजबूत करने की मांग उठाई है। पार्टी लंबे समय से आदिवासी हितों और क्षेत्रीय मुद्दों को राजनीतिक स्तर पर उठाती रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन, वन कटाई और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव के बीच आदिवासी क्षेत्रों की सुरक्षा केवल सामाजिक न्याय का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पर्यावरण सुरक्षा का भी प्रश्न बन चुका है।
ऐसे में जल, जंगल और जमीन से जुड़े आंदोलनों को देशभर में नई गंभीरता से देखा जा रहा है।
मुख्य संदेश
> “जल है तो कल है, जंगल है तो जीवन है, जमीन है तो अस्तित्व है।”
इस नारे के साथ आदिवासी संगठनों ने सरकारों, नीति-निर्माताओं और आम नागरिकों से प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा तथा आदिवासी समुदायों के संवैधानिक अधिकारों को सुनिश्चित करने की अपील की है।

